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संदेश

Jeewan

जीवन जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल। जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल।। रहो हमेशा खुश रे वंदे,जीवन है अनमोल। उठो सबेरे सैर करो तुम, रोग न तुमको चाहेगा । नित्य- नियम पानी पी लेना कब्ज दूर हो जाएगा ।। हाथ धो कर भोजन करना स्वस्थ रहोगे हरदम तुम। अटर-पटर मुंह में कुछ न लेना बीमार तुरंत पड़ जाओगे।। जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल। समय के साथ आगे बढ़ना, मंजिल न दूर होगा । आलस बुरी बलाई रे वंदे,हरदम याद रखना।। गिरो,उठो,संभालो,खुद को, कोई क्या कर लेगा। अगर बुलंद है जोश अपना, बाधा कुछ न कर पाएगा।। जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल। रहो हमेशा सावधान प्यारे,नेकी राह अपनाना। माता- पिता-गुरुजनों से दूरी कभी न करना।। वैर कि भावना कमजोर ही करता,सत्य कि राह पर रहना। धीरज बनाए सदा तू रखना चाहत कमजोर न करना।। जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल। मिलेगी सफलता, मिलेगी शोहरत, कृति होगी चारों ओर। गूंज उठेगा कोयल संग भवरे, नाचे गली- गली में मोर।। नन्द बिहारी कहता सबको दुनियां एक परिवार है। जीवन है अनमोल रे वंदे जीवन है अनमोल।। रहो हमेशा खुश रे वंदे जीवन है अनमोल। जीवन है अनमोल रे वंदे जी...

Paisa

_पैसा एक दिन मजबूरी और पैसे में तकरार हो गई मजबूरी ने पैसे से कहा मैं तुमसे बड़ी हूं क्योंकि मजबूरी में लोग कुछ भी कर सकते हैं मजबूरी में ईमानदार से भी ज्यादा ईमानदार बेईमान और बेईमान से भी ज्यादा बेईमान ईमानदार बन जाता है मजबूरी बड़ी है तो पैसे ने कहा ईमानदार लोग मेरी वजह से ईमानदार और बेईमान लोग भी मेरी वजह से बेईमान होते हैं अच्छे-अच्छो की सीयत बिगड़ जाती है मेरे सामने मुझ में इतनी ताकत है कि मैं अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा बना सकता हूं मेरी ताकत इतनी है कि अगर मैं चाहूं तो एक पल में सब कुछ बंद कर सकता हूं जैसे हवा के बिना सांस नहीं चलती ठीक वैसे ही मेरे बिना दुनिया नहीं चलती मैं दुनिया को उतना ही जरूरी हूं जितना जीने के लिए खाना और पानी मेरे बगैर जीने का कोई ख्याल तक नहीं कर सकता अगर दुनिया ईश्वर के बाद किसी को पूछता है तो वह मैं हूं मैं सर्वोपरि तो नहीं पर दुनिया में ईश्वर के बाद दूसरा स्थान मेरा ही है (पैसा) जहां लोग जिंदगी से हार मान जाते हैं वह मुझे देखते ही उन्हें एक नया जीवन मिल जाता है जिस काम को बड़े से बड़ा नेता भी नहीं कर सकता उसे मैं पल भर में कर देता हूं (पैस...

Jab ham padhenge

जब हम पढ़ेंगे *************************             मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे,जब हम पढ़ेंगे । जब हम पढ़ेंगे-पढ़ेंगे रोज़ पढ़ेंगे।। मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे  जब हम पढ़ेंगे।।             जब मैं पडूंगा तो हाकिम बन जाउंगा। हाकिम बन के मैं अलख जगाउंगा.।।  मेरे किस्मत के सारे ताले खुल जायेंगे,जब हम पढ़ेंगे। मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे,जब हम पढ़ेंगे।।              जब मैं पढूंगा तो डॉक्टर बन जाउंगा । डॉक्टर बनके मै सबको ईलाज करूंगा ।। मेरे किस्मत के सारे राह खुल जायेंगे जब हम पढ़ेंगे ।। मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे,जब हम पढ़ेंगे । जब हम पढ़ेंगे-पढ़ेंगे रोज़ पढ़ेंगे । मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे  जब हम पढ़ेंगे ।।              जब मैं पढूंगा तो मास्टर साहब बन जाउंगा । मास्टर साहब बनके मै सबको पढ़ाऊंगा ।। मेरे अखियां के तारे सारे खुल जायेंगे जब हम पढ़ेंगे । मेरे किस्मत के सारे भाग्य खुल जायेंगे,ज...

Badla mausam

बदला मौसम शाम का वो वक्त धीरे-धीरे ढलता हुआ वो सूरज ढलते हुए सूरज को देखकर वो गुनगुनाती हुई हवाएं धीरे-धीरे वो किरणों का छुपना एक बड़े से रेत के टिब्बे के पिछे सुरज का वो छुपना सोने कि तरह चमकती हुई वो सुनहरि रेत धीरे-धीरे सूरज ढल गया ।और रात हो गई ।पर उफ। रात तो शाम से भी ज्यादा सुहानी लग रही थी। वह बादलों पर सपनों की तरह बिखरे हुए तारे ।वह मंजिल की तरह चमकता हुआ चांद ।वह हलचल मचाने वाली धीमी धीमी जुगनू की आवाज। चांद से ज्यादा खूबसूरत वह तारों से भरा हुआ आसमान ।चांद को देखते देखते फिर सुबह हो गई। सुबह-सुबह वह ओस कि बूंद का पत्तों पर गिरना ।वह चहकती हुई चिड़िया की आवाज ।वह धीरे-धीरे सूरज की किरणों का धरती को छूना। सुबह-सुबह हवाओं का किरणों के साथ वह ठिठौली करना। फिर देखते-देखते माध्यम से सूरज का जलते हुए अंगारे में बदल जाना ।वह सुहाती हुई किरणों का कड़कती धूप में बदलना। मां के आंचल की तरह नर्मी देने वाली रेत का अंगारों में बदल जाना ।फिर वो अचानक से किरणों का आसमान को ढक लेना।। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  R. K EDUCATION : ADDRE...

Chaitra Shukla

हमारा नया साल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ये नया साल हमारा नही है। हमको दिल से प्यारा नही है। ये हमारी संस्कृति नही है। ये हमारा संस्कार नही है। अभी तो जाड़े की रात है। आसमां में घना कोहरा भी। बागों में सर्द हवाएं हैं और सुनसान सड़के। फीका पड़ा है प्रकृति का आंचल। कोई गीत नही कोई अनुराग नही। हर कोई ठंड से कांप रहा है। नव वर्ष मानने का यह कोई दिन नही। चलो न कुछ दिन इंतजार करते हैं। दिल में ये ख्याल बार 2करते हैं। नए साल पर कुछ अलग हो। आज दिल दिमाग़ एक करते हैं। उमंग फीका है हर घर का। अभी तो बहार आई ही नहीं। जाड़े के दिन बीतने दो। कुछ सर्द रातें गुजरने दो। प्रकृति को यौवन चढ़ने दो। फागुन के रंग में रंगने दो। नव वधू बने प्रकृति जब प्रेम गीत सुनाएगी। हरियाली से सजी हुई धरती मां हम सबको हर्षायेंगी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हमारा नव वर्ष मनाया जाएगा। आर्यों का कीर्ति, गौरव सदा के लिए अमर हो जायेगा। Amrita tripathi पता ग्राम व पोस्ट नेवास जिला गोरखपुर प्रकाशित कृतियां अमृत कलश कविता संग्रहसांझा संग्रह शब्द प्रवाह पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध हैं 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 ...

Dadi

दादी से हम मिल न सके हमारी दादी बहुत अच्छी थी। हम सभी भाई बहन दादी से बहुत प्यार करते थे। मां पापा से अधिक दादी ही हमे समझती थी। उनके जैसी प्रेमी और सामाजिक महिला हमने कहीं नहीं देखा था। हमारी मां हम लोगो का उतना ध्यान नहीं दे पाती थी जितना दादी देती थीं बचपन में दादी हम लोगो के लिए हमारी जान थी पापा तो थोड़े गुस्से वाले थे। उनके गुस्से से बचाती थी। सुबह स्कूल जाना होता था घर में बहुत काम भी होते थे दादी जल्दी ही हमे उठा देती थी। हम लोग थोड़े से बड़े हुए अब दादी हम लोगो की सादी के लिए परेशान रहती थी। क्या होगा कैसे होगा ये सब घर में बहुत जिम्मेदारियां थी इसलिए हम दो बहनों की सादी दादी ने एक साथ कराई थी। और हम सब अपने ससुराल भी आ गए। सबसे अधिक कोई रोया होगा तो वह थीं हमारी दादी हम लोग भी दादी के बिना ससुराल में अच्छे से नही रह पा रहे थे जैसे ही एक माह बीता दादी न जाने क्यों हम लोगो से मिलने के लिए बहुत परेशान हो उठी बार बार दादी फोन करती थी की मिलने आ जाओ दादी की बात मानकर मेरी बहन दादी से मिलकर आ गई और मुझे भी दादी रोज फोन करके बुलाती थी लेकीन मेरे घर पर रोज रोज कोई न कोई मेहमान ...

Sikhsha

 शिक्षा हैं शेरनी का दूध* *************************************   शिक्षा वो शेरनी का दूध जो पियेगा दहारेगा। अपनी बदहाली जीवन खुशी-खुशी बितायेगा। आओ शिक्षा का संकल्प लेकर शिक्षित समाज बनाते है। आने वाले पीढ़ियों को उज्ज्वल भविष्य बनाते है। शिक्षा वो शेरनी का दूध जो पियेगा दहारेगा। शिक्षा से हीं सब कुछ होता,मानव का यह श्रृंगार है। इसके बिना जीवन अधूरा,यही तो हम सबका सूत्रधार है। आओ मिलकर शिक्षा का ज्योति जलाए,फर्ज अपना निभाना है। खाओ कसम मातृ-भूमि का हर घर तक शिक्षा पहुंचाना है। शिक्षा वो शेरनी का दूध जो पियेगा दहारेगा। शिक्षा विहीन मानव पशु,यही कलंक हैं दूर करो। नर- नारी ना रहे अब वंचित, सबकी भ्रम को दूर करो। पढ़ेगा मुन्ना बढ़ेगी मुनियां सपना भी साकार करो। अलख जगाओ भरपुर शिक्षा का   आपस में सब विचार करो। शिक्षा वो शेरनी का दूध जो पियेगा दहारेगा। चाहे लाख मुसीबत आवे पतझड़ बनके न जीना है। शिक्षा कि वारिश में भिंग कर  नये उमंग में रहना है। जो कोई शिक्षा को जाना चांद भी उसे सलाम किया। सोने वाले सोता ही रहा जागने वाले सब कुछ पा गया। शिक्षा वो शेरनी का दूध जो पिय...

Chand

चांँद *********************************** आओ करलें दीदार चांद का,चांद बहुत प्यारी है। सबके मन को लुभाती वो पुरानी कई कहानी है। जबसे देखा हूं चांद को, सपने भी साकार हुआ। दादी नानी के किस्से भी मन भावन चमत्कार हुआ।। आओ करलें दीदार चांद का,चांद न हमसे दूर हुआ। सूरत भी सूरत से बोले मुखड़ा चांद का टुकड़ा है। बड़ी सुहावन बड़ी मनभावन शीतल का अंगारा है। छाया बनकर रहते हमेशा खुशियां का गुलमोहर है। परि भी तेरे आगे आकर कहती तू निराली हैं।।  आओ करलें दीदार चांद का,चांद बहुत प्यारी है। यौवनता का रंग भरा मुझमें भी समाई है। तेरे आहट कि परछाई प्रेम कि ज्योत जलाती है।। कैसे मैं भूल जाऊं तुझको पथिक का हम साथी है। ये चांद मुस्कुराते रहना राम रहीम कि वाणी है।। आओ करलें दीदार चांद का, अजब तेरी कहानी हैं। शीतलता की पाठ पढ़ाकर सबको तू शर्माया है। रिश्ते नाते को तू ललचाकर सबमें तू समाया है।। हे चांद तुझको नमन अभिनंदन भी स्वीकार करों। नन्द बिहारी के वादें को नजर से न नजर अंदाज करो। आओ करलें दीदार चांद का,चांद को नमस्कार करों।।              नन्द बिहारी ग्राम-जमैला...

Geeta hi bhagwan he

_ गीता ही भगवान है नर जीवन में कर्मभूमि रणभूमि समान है। दिगविजयी होने के लिए गीता ही भगवान है।। भौतिकवादी भोग ने सबको दुर्योधन बनाया है। ज्ञान विज्ञान के कौशल ने धृतराष्ट सा भरमाया है।। गीता ज्ञान अपनाने में विभेद की जो माया है। दिग्भ्रमित शकुनि का, यह छल का बनाया है।। कर्म क्षेत्र में जो मानव गीता ज्ञान अपनाता है। गांधी और नरेन्द्र जैसे तर के तार जाता है।। निष्काम कर्म और समभाव गीता की मुख्य श्रुति है। उसी राह पर चल कर आज दुनिया में मोदी की तुति है।। मातृवचन से विलखते बाल को शान्ति मिलती है। त्रिताप दग्ध जान को गीता ज्ञान से मुक्ति मिलती है।। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  Giridhari EDUCATION : ADDRESS :

ISRO

_ इसरो (ISRO)तुझे सलाम ************************************    हे भारत के लाल तूने कर दिया कमाल। जो न कर सकी पूरी दुनियां,तूने मचा दिया धमाल।। नमन है तुमको शत-शत मेरा, अभिनंदन भी तुमको करता हूं। तुम जिओ हजारों साल यही कामना करता हूं।। हे भारत के लाल तूने कर दिया कमाल।  सपना जो सजाया हूं वह भी करना तू पूरी। रचना है पूर्ण इतिहास मानव कि कमी पूरी।। देख रहा है केवल तुमको,बस तुम पर ही सब आश है।  कैसे मैं शुक्रियादा करूं नयन मेरा हताश हैं।। हे भारत के लाल तूने कर दिया कमाल।  गर्व है हमको सबसे पहले भारत का वासी हूं। दुनियां है मेरा परिवार उसका छोटा सिपाही हूं।। बचाऊंगा जीवन का सभ्यता,यही सोच के जीता हूं। शरीर का एक-एक कतरा हिंद को समर्पित करता हूं।। हे भारत के लाल तूने कर दिया कमाल।  जीना है तो पीना होगा,पी पी कर मुझे-तुझे जीना है। मानव का जो कर्तव्य है मुझमें, वही हमे निभाना है।। समय मिले तो बस आशीष देना,तुम अपना फर्ज निभाना। मै तो बस कोशिश करुंगा,केवल आप अपना मर्ज बताना।। हे भारत के लाल तूने कर दिया कमाल। याद आती है दादी की कहानी, चंदा मामा दूर के। नानी क...

Tamatar Bhaiya

_ टमाटर भईया हैलो टमाटर भईया सुना है मार्केट में आपके भाव बढ़ गए हैं बहुत इठलाकर कर चल रहे हैं और अहंकार भी आपका बढ़ा हुआ है सही सुना है तुमने आगे और सुनो जिनकी 50हजार सैलरी है वो मुझे 1kg लाते हैं और फ्रिज में रखकर हफ्तों चला रहे हैं जिनकी सैलरी 35हजार हैं वो मुझे आधा किलो लाते हैं और 15दिन फ्रिज में रखकर चला रहे हैं जिनकी सैलरी 25हजार है वो बेचारे 250ग्राम लाते हैं और लंच की सब्जी में डालकर ले जा रहे हैं जिससे उनका स्टेट्स बना रहे जिनकी सैलरी 20से 15हजार हैं वो तो मेरा स्वाद कुछ दिनों से भूल गए हैं दाल सब्जी बिना टमाटर के खा रहे हैं और मेरे भाव गिरने का इंतजार कर रहे हैं उनको बस ये याद है कि मैं लाल लाल दिखता हूं और खाने का स्वाद बढ़ाता हूं और आगे सुनो जिनकी सैलरी लाख रुपए होगी उनको तो कोई फर्क नहीं है मेरा भाव बढ़े या घटे वो तो मुझे आराम से खा रहे हैं समझे अच्छा टमाटर भईया हमारे घर कब आओगे चिंता न करो दिसंबर की कड़ाके की ठंडक आने दो सबके घर पर आऊंगा और सबके घर की दाल सब्जी का स्वाद बढ़ा दूंगा तब तक मुझे मार्केट में इठलाकर कर चलने दो बाय बाय Amrita tripathi P...

Chand

_ चाँद चाँदनी रात मे चाँद कि याद मे , कागज कलम लिए बैठा था मैं , सवाल था खुद से कि , क्या लिखु  और कहां से शुरूआत करू मे ? ख्वाबों से, हकिकत से, या करू पहली मुलाकात से, तेरी रेशमी बालों से या माथे कि बिंदिया  से , तेरी छोटी सी मुस्कान से या तेरे नन्हें   होठों से। तेरी मोती सी आंखों से या गुलाबी गालो से , तेरी मीठी सी आवाज से, या तेरे मोर पंख के झुमके से। तेरी मटकती चाल से या दौड़ भाग कि मस्ती से , तेरे प्यार भरे हेलो से या मखमल जैसे हाथो से। सोचता रहा , सोचता रहा, ख्यालों  मे खो गया मैं , कलम हाथ से गिर गई , कागज उड़ गया हवा मे। मेरे सपनों कि  रानी सपनों मे खो गई , ख्वाब , ख्वाब ही रह गया और नीदं टूट गई। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  Neelkamal Malviya EDUCATION : ADDRESS :

Kahani

_ उस रात जब भी मै सोई  31december 2021.  2pm  क्या पता था कि तुम मुझे फ़िर मिलोगे, मैं बेखबर इस बात से कुछ तारो को गिन अपनी आँखें  बंद करने ही लगी, कि एक बून्द मेरी आँखो पर  आ  गिरी  मेरा मन एकदम से धुल गया पर इस चन्दनी सी रात और तारो से भरे इस आसमान पर बदलो का नामो निशान नहीं था, फ़िर ये नन्ही सी बून्द (हाए ) इतना कहकर  मैं सो गई  तकरीबन रात 2बजे मेरा फोन रिंग हुआ, मैने आँखें खोली और आँखो पर अपने हाथ मलते हुए फोन उठाया   तो देखा arjun दिल्ली  उस समय हल्की ठंडी हवा मेरी आँखो को  सुकून दे रही थी, पर मुझे क्या पता था ये हवा मेरे अतीत का वो हिस्सा अपने साथ लाई है  जिसे मैने कई सालो पहले  "दिल्ली के उस शहर की गली मे छोड़" लखनऊ की गलियों मे आके खुद को रोज थोड़ा थोड़ा मिटाती रही रोज खुद को भुलाती  रही  मै अभी इन खयालो से निकली भी नहीं  कि  फोन के दूसरे तरफ़ से एक अफ़सोस भरी अवाज मे मुझे मेरा नाम सुनाई दिया " इशानी "मै एकदम से मर सी गयी उस वक़्त के लिए. और क्यो ? लोगो को अपने मन का ही करना होता है...

Kabhi kabhar

_ कभी कभार मे उसके शहर कभी कभार मे उसके शहर, कभी कभार वो मेरे गाँव आया करती थी  हमारे बीच जो फ़सला रहा वो नदी बहुत इतराया करती थी  मे गाँव का वो शहर की, उसकी माँ ये उसे पढ़या करती थी  वो रहती थी पक्के मकानो मे ,और मेरे घर को बरिश भिगोया करती थी, घबराती नहीं वो हिम्मती बहुत है अपने अंचल से बून्दे छिपया करती थी  कभी कभार मै उसकी जुल्फ़े ,कभी कभार वो मेरे माथे के बालों को सहलया करती थी  मै गर्म दोपहरॊ मे तपता रहा. वो सरसो के फूलो मे मुस्कुराया करती थी मै खेत की माटी मे रंगता रहा, वो ओसो से मुझको नेहलया करती थी  कभी कभार मै उसकी बाते ओर कभी कभार वो मेरी हाँ मे हाँ मिलया करती थी  वो शहर की समझदार लड़की मेरे नाम का कुमकुम लगया करती थी  मुझ देहाती गवार को देशी छोरा बता के अपनी सहलियो से मिलवाया करती थी  हाँ वो लड़की कभी कभार मेरे गाँव आया करती थी 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  Nirmala Rawat EDUCATION : ADDRESS :

keh do ki chaand

_ कह दो  की चाँद कह दो की  चाँद  हमारा नही है , इस दुनियां से नाता गवारा नही है   मै मर तो गई थी उस रात मगर , अभी उसने मुझे दफनया नही है,  ये दिल ये जिस्म ये रूह है उसकी , अभी उसने मुझे भुलाया  नहीं है   बरिश कि बून्दे क्या कहती है   भला ,अभी उसने मुझे कुछ सुनाया नही हैै , तुम ठहरो, तुम ठहरो, तुम ठहरो जरा , अभी उसने मुझे सीने से लगाया नही है 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  Nirmala Rawat EDUCATION : ADDRESS : Lucknow

गैरसैंण

हॉस्पिटल से वंचित उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण मेरा नाम मोनिका खत्री है। मेरी जन्मभूमि खत्रीयाणा है, मुझे गर्व है अपने जन्मभूमि पर खत्रीयाणा गांव एक पहाड़ी गांव है,जो की उत्तराखंड के चमोली जिले के गैरसैंण क्षेत्र में पड़ता है। गैरसैंण नाम पड़ कर काफी लोग जान गए होंगे कि यह नाम जाना पहचाना है। हां जी सही पड़ा आपने में गैरसैंण की ही बात कर रही हूं, जो की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यहां हर चीज की सुख सुविधा तो उपलब्ध कराई जा रही है,लेकिन लोगो को जिस चीज की यानी हॉस्पिटल की अत्यधिक  जरूरत है,उसका आज भी दूर_दूर तक कोई नाम नही, पहाड़ के लोग बहुत साधारण होते है,उन्हें सरकार के यह आलिशान भवन और चका_चौदं से कोई मोह नही है, वहां के लोग अपने पहाड़ों में बहुत खुश है। गैरसैंण में लगभग 200+ गांव है जिन्हे हर रोज इस समस्या से जूझना पड़ता है,और अपने परिजनों को लेकर 50 से 100km हर रोज सफर करना पड़ता है। लोगो की आधी उम्र गुजर गई अपने नजदीकी में अच्छे हॉस्पिटल को देखने के लिए। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है,मेरी मौसी की तबियत अचानक खराब हुई वहां नजदीकी में अच्छे अस्पताल ना होने के कार...

Sarkari teacher aur chhuttiyan

_सरकारी टीचर और छुट्टियां  बड़े दिनों के बाद है आई, ये गर्मी की छुट्टियां, मौज - मस्ती की सेकेंगे अब घूम - घूमकर रोटियां, बहुत बनाए प्लान साल भर, यहां - वहां जाने का, बड़ी मुश्किल से टिकिट बनाया, कश्मीर घूम आने का, जाने का तो कन्फर्म हो गया, वेटिंग रह गया आने का, घर बैठे इंतजार कर रहे, अच्छे दिनों के आने का। सुबह - शाम सेक रहे है, घरवालों के लिए रोटियां। बड़े दिनों.....................................रोटियां।। रोज लहसून पकड़ा देती है बीबी, छीलकर लाने को, अंगूठा और अंगुलियों रोती है, देख लहसून के प्याले को, काट - काट कर प्याज छाले हो गए हाथों में, बेबसी का नीर छलक आया नाक और आखों में। रोज सब्जी में लगा छोंक आंखों में हो गया है मोतिया।। बड़े दिनों.....................................रोटियां।। श्रीमती जी ने शुरू करवाया है, फर्नीचर का काम, आधी छुट्टियां बीत गई, नही है सुस्ताने का काम,  धूल, मिट्टी और बुरादे की है चारो तरफ भरमार, घर में सांस लेना भी अब हो गया है दुसवार। खक ही खक से सन गई है, सभी जन की चोटियां। बड़े दिनों.....................................रोटियां।। गर्मी ने ...

Middle Class

_मिडिल क्लास  घर की जिम्मेदारी,आ गई सर पर पर शुरू नही कमाई है, घर का राशन लाने खातिर  बहुत सी इच्छा दबाई है, पर ख्वाब अभी भी,है जिंदा यही मिडिल क्लास सच्चाई है।। वो घर बनाने का सपना, वो अपनी गाड़ी की चाहत, मां का इलाज करवाने खातिर, इनकी एफडी तुरवाई है, पर ख्वाब अभी भी,है जिंदा  यही मिडिल क्लास सच्चाई है।। दिवाली आ गई नजदीक  पर बोनस नही मिला अब तक, बच्चो के कपड़े लेने है, घर को भी तो रंगवाना है, इतना सब कुछ करना है पर पैसे की चल रही तंगी है। पर ख्वाब अभी भी,है जिंदा यही मिडिल क्लास सच्चाई है।। बेटे का पहला साइकिल या बेटी की पहले ड्राइंग बुक, बहन की शादी की खुशियाँ या  गम में निकले सारे आंसू, मन के किसी एक कोने में  इन सब की जगह बनाई है, यही मिडिल क्लास सच्चाई है।। अमीरी ने अमीरी से बहुत इमरते बनाई है, बुजुर्गो की धरोहर को लेकिन मिडिल क्लास संजोता है। जमी से है जुड़े हुए  किसानी भी है कर डाली, क्षेत्र कोई भी हो इनको छूनी ऊंचाई है, यही मिडिल क्लास सच्चाई है।। इनका,बैंक एक सहारा है वहां पूंजी कुछ बचाई है, विपदा की परिस्थितियों में यही बनती असल कमाई ह...

Suryaputra karna

_ सूर्यपुत्र कर्ण जन्म देते ही माता ने जिसको  नदी में था छोर दिया, समाज में लाज बचाने खातिर पुत्र से नाता तोड दिया। रथ चालक ने गोद लिया घर अपने उसको ले आया, राधा मां का प्यार पाकर  राधेये फिर वो कहलाया। धनुर्विद्या सिकने की उसने  इच्छा अपनी बतलाई, गुरु द्रोण के समक्ष पहुंचकर झोली अपनी पशराई। गुरु द्रोण प्रसन हुए राधेये का कौशल पहचाना, देख सूर्य का तेज़ माथे पर  कर्ण नाम उसे दे डाला। पर विद्यादान नही दे सकते उनकी भी मजबूरी है, गुरुकुल में बस राजपुत्रो को आने की मंजूरी है। ब्राह्मण वाला भेस बनाकर  परशुराम का शिष्य बना, सीखकर धनुर्विद्या उसने ख्वाब अपना पूर्ण किया। पेड़ के नीचे कर्ण बैठा था  गुरुवर गोद में सोए थे, कर्ण उन्हें देख रहा वो गहरी नींद में सोए थे। कर्ण के पाव में कीड़े ने  विश अपना घोल दिया, कर्ण के पाव से लहू का  रास्ता बाहर खोल दिया। सहता रहा कर्ण पीड़ा को  गुरु की निद्रा भंग न की, लहू के ताप से परशुराम की निद्रा आखिर टूट गई। देख कर्ण को खून से लथपथ आशचर्य गुरुवर रह गए, ब्राह्मण के सहनशीलता को देखकर सोच में ही पर गए। समझे की य...

he aurat

_ हे औरत  हे औरत तू कैसे बेटी से बहु बन जाती है,, , हे औरत तु कैसे बेटी से बहु बन जाती है,,, जीस आँगन मे बचपन बीता  वो आँगन हो जाता पराया "  जिस बाबुल ने चलना सिखाया,  उसने ही डोली मे बैठाया    डोली उतर कर जब दुजे घर जाए,  माँ छोड़ नयी माँ को पाए फिर से जैसे जनम हुआ,  फिरसे नया आँगन है मिला  जहाँ करते रहते अपनी मनमानी  वो बाबुल का आँगन पराया हुआ  नए माहौल में ढलना है, नयी जिमेदारी आ जाती है।  जो सोती थी देर सुबह तक वो अब जल्दी से उठ जाती है  तरह तरह की बाते सुन कर चुप चाप वो रह जाती है  पिता से जिद करके जो हर काम पसंद का करवाती है।  नये घर मे पति की पसंद की हर चीज  से खुश हो जाती है  हे औरत तु कैसे बेटी से बहु बन जाती है।  माँ से लड़ झगड़ कर बात बात पर रूठ जाती है  सासु माँ की हर बात सर झुखा कर मान जाती है  हे औरत तु कैसे बेटी से बहु बन जाती है।  छोटी छोटी बात पर नाखरे खुब दिखाती है।  मन का कुछ ना हुआ तो सारा घर सर पर उठा लेती है  पसंद ना हो फिर भी पति की पसंद को अपना...

Vakt hi sachha saathi

_ वक़्त ही सच्चा साथी हैं - वक़्त ही सच्चा साथी हैं--  दुख में सुख मे हर वक़्त बस वक़्त ने हमें संभाला है,  हम सबको इस दुनिया के सच्चाई से वाकिफ कराया हैं,  जब जब उड़ते हैं हम ख्वाबों मे हकीकत से हमें रूबरू कराया हैं,  होगे सबके best fend for ever वाले,,,, पर हम सब का तो वक़्त ही सच्चा साथी हैं,, कदम कदम पर वक़्त ने हमको अपनी औकात दिखाया हैं  वक़्त से बड़ा ना दुश्मन कोई ना वक्त से बड़ा है दोस्त कोई हम नही हैं, कुछ भी अभी हमको खुद की पहचान बनाना हैं जब खुद को समझ बैठते हैं राजा तब तब ये बात वक़्त ने हमें एहसास कराया हैं कोई  नही है सच्चा साथी , ये वक्त ,वक्त पर वक्त ने हमे बताया हैं  वक़्त की जिसको कदर नही वक़्त ने उसको खुन के आँशु रुलाया हैं,,, अगर कर लिए कदर वक़्त की तो, वक्त ने माटी को भी सोना बनाया हैं कोई माने या ना माने पर  वक्त ने भटके को भी राह दिखाया हैं  कर लो वक्त की कदर , वक़्त ही सच्चा साथी हैं।  कर लो  वक्त की कदर वक्त ही सच्चा साथी है 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  ...

Kishore singh ji

किशोर सिंह जी श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, शरण में ले ले हे ब्रिज बिहारी हे नाथ नारायण, हे, वासुदेवा। खुशियों से झोली भर दे महादेवा। नाम है किशोर सिंह, लेकिन तन से हूं थोड़ा वृद्ध, चलाता हूं गाड़ी स्टाफ की, और बोलता हूं शुद्ध। करता हूं स्वागत सभी का उनके आगमन पर, प्रफुलित हो उठते है सब, मेरी इस नजाकत पर। मन का हूं मौजी, और बातें करता हूं बहुत कम, सभी का मन बहलाता हूं, और मिटा देता हूं गम। जब सभी होते है निद्रा में, तो अचानक से बोल पड़ता हूं,  देख उनकी बौखलाहट खिलखिला कर हंस पड़ता हूं। ये तो उनको जगाने का एक तरीका अपनाया है, लेकिन ये प्यार भी तो उन्होंने ही पनपाया है। भोले बाबा का भक्त हूं, डोडा अफ़ीम खा के मस्त हूं, कर गाड़ी थोड़ी धीमी, 4-5 बार तंबाकू भी दबा लेता हूं,  लगा के झाड़ा, भूत -प्रेत और डाकनी भी भगा देता हूं। करता हूं रोज वंदन, खाटू के श्याम का, प्रभु, अब तो करो उद्धार इस गरीब नवाज़ का। आरजू थी एक रूपियों से भरे कट्टे की, नही चाहिए रकम मुझे गलत काम और सट्टे की। लिखवाई है चिट्ठियां आपको कई, कभी परमानंद जी से तो कभी देवेंद्र भई। शायद, लिखने में ही कुछ कमी रह गई,...

Doli

डोली  एक नादान सी, चुलबुली सी, कभी खूंखार तो कभी बेजान सी, करती है मनमानी, बनती सबकी नानी, शक्ल है सुहानी, पर लगती है बेगानी। हंसी - ठिठोली खूब है करती, अपनी मां की एक न सुनती, बात - बात पर उन्हें डांटती, लेकिन स्नेह उन्ही से करती। ट्यूशन लेती है खूब जोर, खूब मचाती है उसमें शोर, बांधे रखती सबकी डोर, नही होने देती किसी को बोर। कपड़ों की है बहुत क्रेजी, बिलकुल नहीं होती इसमें लेज़ी, हर महीने मार्केट जाती है, कुछ न कुछ ड्रेस वो उठा आती है, जो लाजू को जरा भी पसंद नही आती है। स्वीटी, राजल से करती हैं प्यार, घर बुलाती है उन्हे बार - बार, सहती है उनके नखरे हजार, पटा लेती है उन्हे खिला अचार। नाम है इसका डोली, बिलकुल भी नही है भोली, सबको देती है खूब गोली, कभी नही खेलती होली। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet  Vijay singh jagawat EDUCATION : ADDRESS :