केनवास निखर रही हूँ थोड़ी सी तुम्हारे सानिध्य में उकेर रही हूँ आकृतियांँ टेढी मेढ़ी आड़ी-तिरछी कलम फिसल कर जाती है जब केन्वास के कोरों तक.... तब तुम्हारी उंगलियांँ थाम लेती है मेरी उँगलियों की डोर.. तब उभरती है एक सुगढ़ सुंदर आकृति... सुनो.. क्या रंग भी भरोगे इसमे? बिछोह की पीड़ा से परिपूरित.. प्रेम और स्नेह के शब्दों से....??? हमसे जुडने के लिए👉 यहाँ click करें 👈 Poet Vandana Bhandari EDUCATION :M.A in Political science and public administration ADDRESS : Mumbai Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।
Kavita,poem,shayari,suvichar Kahani,chutkule