_ || अधूरे चाँद जैसा इश्क़ || सूनी डगर पे मैं तेरा नाम लेता रहा हाँ... नाम लेता रहा... तू ग़ैरों की महफ़िल में, मैं तन्हाई सहता रहा बेवफ़ा... तन्हाई सहता रहा | तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया | मिले न मौत मुकम्मल, न चैन पूरा आया कफ़न मिला न मुझको, न तेरा साया आया | ज़िंदा जला दिया मुझे तेरी बेरुख़ी ने इस क़दर कि मेरी राख से भी बस, तेरी ही वफ़ा का धुआँ आया | तू मुकम्मल कहानी किसी और की बन गई मैं अधूरा सा अफ़साना तेरा रह गया | तेरी डोली उठी तो मेरा जनाज़ा भी सज गया तू हँस के रुख़्सत हुई , मेरा ख़ुदा भी रो दिया | तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया... अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया... ~बाल कृष्ण मिश्रा , नई दिल्ली |
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