Shiv Shakti सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Shiv Shakti


_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥



शिवालयों से शंखनाद हुआ, 

गूंजा यह संदेश,

हर नारी में दुर्गा जागे, 

हर पुरुष शिव रूप बन जाए।


हर थिरकन में सृष्टि की लय,

साँसों में ओमकार समाए।

हर नारी में दुर्गा जागे,

हर पुरुष शिव रूप बन जाए।


सृष्टि का हर कण है पावन, 

शक्ति का हर रूप अनमोल,

नारी जब सँवारे घर-आँगन, 

और रण में भरती हुँकार।

दुर्गा बन संहारे दानव, 

काली बन मिटाए अंधकार,

उसकी ममता में विष्णु बसें, 

संहार में बसा महेश का सार।


ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति 

हर थिरकन में सृष्टि की लय

हर नारी में दुर्गा जागे, 

हर पुरुष शिव रूप बन जाए।


पुरुष जब ध्यान में लीन हो, 

जटा में गंग बहे अविरल,

डमरू की थाप पर नाचता, 

काल भी बन जाए शांत और सरल।


मिट जाए असुरत्व जगत से,

सतयुग सा उजियारा आए।

हर नारी में दुर्गा जागे,

हर पुरुष शिव रूप बन जाए।


पार्वती संग प्रेम है उसका, 

अर्धनारीश्वर रूप महान,

हर पुरुष में वही शिवत्व है, 

जो त्याग और तप का है ज्ञान।


~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Dansh le jo tu mujhe

_   दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ! यह कविता भीतर के सूनापन, अधूरेपन और गहरी मोहब्बत की उस कसक को व्यक्त करती है, जो यादों और चाहत के बीच इंसान को बेचैन भी करती है और सुकून भी देती है। भाव इतने गहरे हैं कि हर पंक्ति दिल की धड़कनों को छूती है। 💔 दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए 💔 बीते लम्हों का सूनापन तेरी यादों का महकता चंदन आंखें में थमी तेरी परछाई, रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | कहां मुमकिन है मोहब्बत को लफ्ज़ों में बयां कर पाना । आसान नहीं भुला, यादें सुकून की नींद में सो जाना । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | जीवन के पावन ‘निर्झर’ को, तुम यूँ ही बह जाने दो । एक पल, बस एक पल, नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो । तारों की चादर ओढ़, चाँद की रोशनी में खो जाऊं । तेरी मोहब्बत की खुशबू में, खुद को फिर से पा जाऊं । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है, जैसे एक सिसकी.… जैसे एक सिसकी । ये कैसा अधूरापन ? ये कैसा सूनापन ? शायद यही है इश्क...

Sannata

_  विरह का सन्नाटा सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। ~ बाल कृष्ण मिश्रा,    नई दिल्ली