_ श्री महाकाल तांडव स्तुति
सदाशिव शंकर महेश्वर महेश,
परमेश्वर त्रिलोचन त्रयंबक त्रिनेत्र।
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय,
भव-भय हरन भोलेनाथ, जय जय शिव शंकराय॥
प्रचंड-तांडव-नृत्य-रत, दिगंबर-विश्वरूपम्,
शून्य-हृदय-निवासी, पूर्ण-ब्रह्म-अनुपमम्।
अनादि-अनंत-कालचक्र-अधिपति, महादेव-महंतम्,
क्षण-भंगुर-लीलाधारी, विभु-अविनाशी-अनंतम्॥
जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-निलिम्प-निर्झरी,
शीश-शशांक-धवल-दीप्ति, अमृत-रस-झरी।
व्याल-कराल-माल-कंठ, भस्म-विलेपन-धारी,
वैराग्य-पुंज-महायोगी, त्रिपुर-अरि-विनाशकारी॥
त्रिशूल-धारिणी-शक्ति, न्याय-वज्र-प्रहारम्,
डमरू-नाद-गुंजित-ब्रह्मांड, सृजन-स्वर-सारम्।
महानाश-कुक्षि-स्थित, नूतन-सृष्टि-विधानम्,
रुद्र-भीषण-संहार, शिव-सौम्य-निर्माणम्॥
काल-काल-महाकाल, काल-जयी-अनामी,
चराचर-जगत-रक्षक, विश्वेश्वर-स्वामी।
करुणा-पारावार-शंभू, तारन-तरन-हारी,
शरण्य-चरण-कमल-अर्पित, जय-जय-पुरारी॥
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय,
हर हर महादेव, जय शिव शंकराय॥
~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |
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यह अत्यंत सुंदर और ओजस्वी "श्री महाकाल तांडव स्तुति" है। बाल कृष्ण मिश्रा जी द्वारा रचित यह पंक्तियाँ भगवान शिव के संहारक और रचयिता, दोनों रूपों का बहुत ही प्रभावी वर्णन करती हैं।
जवाब देंहटाएंइस स्तुति की कुछ मुख्य विशेषताएँ:
महाकाल का स्वरूप: इसमें शिव के 'प्रचंड तांडव' और 'दिगंबर' रूप का वर्णन है, जो काल (समय) के अधिपति हैं।
दार्शनिक गहराई: "क्षण-भंगुर-लीलाधारी" और "नूतन-सृष्टि-विधानम्" जैसी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि शिव का विनाश वास्तव में नई सृष्टि का आधार है।
अलंकारिक भाषा: "जटा-कटाह-संभ्रम" जैसे शब्द रावण रचित 'शिव तांडव स्तोत्र' की याद दिलाते हैं, जो शिव की जटाओं और गंगा के प्रवाह की महिमा गाते हैं।
हर हर महादेव!
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बाल कृष्ण मिश्रा जी द्वारा रचित "श्री महाकाल तांडव स्तुति" भगवान शिव के विराट स्वरूप, उनके संहारक और सृजक दोनों रूपों की महिमा का एक सुंदर मिश्रण है। इस काव्य का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
जवाब देंहटाएंशिव के विविध स्वरूप: कविता की शुरुआत शिव के अनेक नामों (सदाशिव, महेश्वर, त्रिलोचन) के स्मरण से होती है, जो उन्हें परमेश्वर और संसार के दुखों (भव-भय) को हरने वाला बताती है।
तांडव और ब्रह्मांडीय अस्तित्व: इसमें शिव के प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन है। वे 'दिगंबर' (आकाश रूपी वस्त्र वाले) और 'विश्वरूप' हैं, जो कालचक्र के अधिपति हैं। वे शून्य में निवास करते हैं और स्वयं पूर्ण ब्रह्म हैं।
दिव्य श्रृंगार: कवि ने शिव की जटाओं से बहती गंगा, मस्तक पर चंद्रमा की धवल चांदनी और गले में लिपटे विषैले सर्पों का चित्रण किया है। वे भस्म लगाकर वैराग्य का संदेश देते हैं।
सृजन और विनाश का संतुलन: काव्य शिव के विरोधाभासी गुणों को दर्शाता है। एक ओर उनका त्रिशूल और डमरू का नाद संहार का प्रतीक है, तो दूसरी ओर उनके इसी रुद्र रूप में नूतन सृष्टि का विधान और सौम्यता छिपी है।
करुणा और शरण: अंत में, शिव को 'काल का भी काल' (महाकाल) और जगत का रक्षक बताया गया है। वे करुणा के सागर हैं और उनके चरणों में समर्पित होकर ही जीव संसार रूपी सागर से पार उतर सकता है।
निष्कर्ष: यह स्तुति शिव के अजेय और अविनाशी रूप को नमन करती है, जो संहारकर्ता होते हुए भी परम कल्याणकारी और भक्त-वत्सल हैं।
..."हर हर महादेव"
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