_ मानवता
🙏🙏जय माँ सरस्वति🙏🙏
“यह कविता ‘मानवता’ हमारे समाज में बढ़ती ठिठुरन और दया-भाव के अभाव को व्यक्त करती है। खुशबू पांडे त्रिपाठी द्वारा लिखित यह हिंदी कविता विशेष रूप से शीत, कोहरा तथा मानवीय संवेदनाओं पर केंद्रित है।”
ठिठुर रहा है सब, वन उपवन ठिठुरा रहा जग सारा ।
ठिठुर गई हैं सुन्दर कलियाँ, है ठिठुरा हुआ नजारा ।।
ठिठुर गई है धरती अम्बर है, ठिठुरा हुआ उजियारा ।
ठिठुर गई हैं बहती नदियाँ, ठिठुरा हुआ किनारा ।।
ठिठुर न ज़ाए पुलकित मानव दया का ह्रदय तुम्हारा ।
ठिठुर गई हैं गीली रातें हैं, ठिठुरा हुआ दिन बेचारा ।।
टपक रहै हैं ओश ऐसे,टपके जैसे मोती।
घासों के झुरमुट में गुंथे गुंथी हो जैसे चोटी।।
धूल लपेटे वृक्ष खड़े हैं, लिपटी हों जैसे धोती।
कोहरे की मुस्कान खिली है, नज़र बड़ी खोटी।।
सूरज की किरणों को देखकर शर्दी खूब बड़ाए।
रातों को यह ठंडे कोहरे फूले नहीं समाए।।
ठिठुर रही है ,अब मानवता, प्रेम जगह न पाए।
रोश ,क्रोध और निन्दा नफरत दिन प्रति पैर बड़ाए।।
~ खुशबु पांडे त्रिपाठी
Nice poem
जवाब देंहटाएंआपकी यह कविता ठिठुरन को सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे मानवता की ठंड पड़ती संवेदनाओं से जोड़ देती है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।
जवाब देंहटाएंप्रकृति के दृश्य—ओस, झुरमुट, वृक्ष, कोहरा—सब इतने साफ़ और जीवंत दिखते हैं कि पाठक उन्हें अपने सामने महसूस कर लेता है। और फिर जब वही ठिठुरन मानवता पर आती है, तो कविता अपने गहरे संदेश तक पहुंचती है।
आपने सरल शब्दों में बहुत गहरी बात कही है—कि मौसम की ठंड से ज्यादा डर मन की ठंड का है। प्रेम, दया और करुणा की कमी को जिस तरह आपने चित्रों के ज़रिये दिखाया है, वह प्रभावशाली भी है और सोचने पर मजबूर भी करता है।
समग्र रूप से यह कविता भाव, सौंदर्य और संदेश—तीनों का सुंदर संयोजन है।
Bhot achhe
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