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Virah

विरह



अधूरा चाँद, अधूरा इश्क़ 

अधूरे एहसास, फिर.. 

ये विरह पीड़ा क्यू पूरी है

जो यादों के रूप मे  

उठती है... 

किसी बवंडर सी

श्वासों के उछवास सी 

तुम्हें ही खुद मे.. 

महसूसती हूँ 

हर श्वांस के साथ.. 

फिर शांत होकर 

छोड़ जाती है

करोड़ों ओस के कण

जो मानस पटल पर 

जम जाते हैं 

फिर उन कणों पर 

उंगली घुमा कर.. 

उकेरती हूँ तुम्हारा नाम 

जोड़ती हूँ ...

अपने नाम के साथ

और फिर होंठो से छूकर ..

अपनी प्रीत की मुहर लगाती हूँ 

सुनो.. 

सदा रहना 

मेरे अंदर 

यादों से पूरित 

ओस की बूँदें बनकर..


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Poet

Vandana Bhandari

EDUCATION : M. A in political science and public administration
ADDRESS : Mumbai


Publisher

Om Tripathi

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