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Doli


डोली 



एक नादान सी, चुलबुली सी,
कभी खूंखार तो कभी बेजान सी,
करती है मनमानी, बनती सबकी नानी,
शक्ल है सुहानी, पर लगती है बेगानी।

हंसी - ठिठोली खूब है करती,
अपनी मां की एक न सुनती,
बात - बात पर उन्हें डांटती,
लेकिन स्नेह उन्ही से करती।

ट्यूशन लेती है खूब जोर,
खूब मचाती है उसमें शोर,
बांधे रखती सबकी डोर,
नही होने देती किसी को बोर।

कपड़ों की है बहुत क्रेजी,
बिलकुल नहीं होती इसमें लेज़ी,
हर महीने मार्केट जाती है,
कुछ न कुछ ड्रेस वो उठा आती है,
जो लाजू को जरा भी पसंद नही आती है।

स्वीटी, राजल से करती हैं प्यार,
घर बुलाती है उन्हे बार - बार,
सहती है उनके नखरे हजार,
पटा लेती है उन्हे खिला अचार।

नाम है इसका डोली,
बिलकुल भी नही है भोली,
सबको देती है खूब गोली,
कभी नही खेलती होली।

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Poet

 Vijay singh jagawat

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