Kabhi kabhar सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Kabhi kabhar


_ कभी कभार मे उसके शहर



कभी कभार मे उसके शहर, कभी कभार वो मेरे गाँव आया करती थी 
हमारे बीच जो फ़सला रहा वो नदी बहुत इतराया करती थी 
मे गाँव का वो शहर की, उसकी माँ ये उसे पढ़या करती थी 
वो रहती थी पक्के मकानो मे ,और मेरे घर को बरिश भिगोया करती थी, घबराती नहीं वो हिम्मती बहुत है अपने अंचल से बून्दे छिपया करती थी 
कभी कभार मै उसकी जुल्फ़े ,कभी कभार वो मेरे माथे के बालों को सहलया करती थी 
मै गर्म दोपहरॊ मे तपता रहा. वो सरसो के फूलो मे मुस्कुराया करती थी
मै खेत की माटी मे रंगता रहा, वो ओसो से मुझको नेहलया करती थी 
कभी कभार मै उसकी बाते ओर कभी कभार वो मेरी हाँ मे हाँ मिलया करती थी 
वो शहर की समझदार लड़की मेरे नाम का कुमकुम लगया करती थी 
मुझ देहाती गवार को देशी छोरा बता के अपनी सहलियो से मिलवाया करती थी 
हाँ वो लड़की कभी कभार मेरे गाँव आया करती थी

👉हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें👈

Poet

 Nirmala Rawat

EDUCATION :
ADDRESS :







टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

हमें बताएं आपको यह कविता कैसी लगी।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Ummeede

_   उम्मीदें उम्मीदें इस जहाँ में बस ख़ुदा से रखना तुम साबरी इंसान कभी किसी के साथ वफ़ा नहीं करते। जो क़ैद कर ले किसी को अपनी यादों में, तो मरने तक उनको उस यादों से रिहा नहीं करते। रूह से इश्क़ करना ये बस ख़्वाबों-ख़यालों  फिल्मों में सुन रखा होगा सबने, हक़ीक़त में इस जहाँ में लोग बिना जिस्म के इश्क़ का सौदा नहीं करते। वादे करके भूल जाना तो इंसान की फ़ितरत है। यहाँ वादे ख़ुदा से भी करके लोग पूरा नहीं करते। ~ Drx Ashika sabri (Age: 22) Bsc ,D pharma Varanasi(U.P)

Shiv Shakti

_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥ शिवालयों से शंखनाद हुआ,  गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन,  शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन,  और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव,  काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें,  संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति  हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो,  जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता,  काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका,  अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है,  जो त्याग और तप का है ज्ञान। ~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

Sannata

_  विरह का सन्नाटा सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। ~ बाल कृष्ण मिश्रा,    नई दिल्ली