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Kabhi kabhar


_ कभी कभार मे उसके शहर



कभी कभार मे उसके शहर, कभी कभार वो मेरे गाँव आया करती थी 
हमारे बीच जो फ़सला रहा वो नदी बहुत इतराया करती थी 
मे गाँव का वो शहर की, उसकी माँ ये उसे पढ़या करती थी 
वो रहती थी पक्के मकानो मे ,और मेरे घर को बरिश भिगोया करती थी, घबराती नहीं वो हिम्मती बहुत है अपने अंचल से बून्दे छिपया करती थी 
कभी कभार मै उसकी जुल्फ़े ,कभी कभार वो मेरे माथे के बालों को सहलया करती थी 
मै गर्म दोपहरॊ मे तपता रहा. वो सरसो के फूलो मे मुस्कुराया करती थी
मै खेत की माटी मे रंगता रहा, वो ओसो से मुझको नेहलया करती थी 
कभी कभार मै उसकी बाते ओर कभी कभार वो मेरी हाँ मे हाँ मिलया करती थी 
वो शहर की समझदार लड़की मेरे नाम का कुमकुम लगया करती थी 
मुझ देहाती गवार को देशी छोरा बता के अपनी सहलियो से मिलवाया करती थी 
हाँ वो लड़की कभी कभार मेरे गाँव आया करती थी

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Poet

 Nirmala Rawat

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