रिश्ते रिश्तो की इस दुनिया को। कैसे समझे और समझाएं हम। क्या गलत है और क्या सही। इसका उत्तर कैसे पाएं हम। हाथ पकड़ कर कोई ऊपर उठाता नहीं। टांग खींचने की परंपरा का शिकार है हम। अहम की दीवार क्यों टूटती नहीं। मैं और मैं को छोड़ कब बन पाएंगे हम। स्वार्थ लिप्सा में बंधे हैं सारे रिश्ते। ऐसे में त्याग को कैसे अस्त्र बनाएं हम। सभी है परेशान मुझे क्या मिला क्या मिला। क्या दिया है यह कैसे बताएंगे हम। अधिकारों को लेकर यहां सभी हैं सजग। अपने कर्तव्य बोध को कैसे जगायेंगे हम। एक चेहरे पर लगे हैं कई चेहरे। असली चेहरे को कैसे पहचान पाएंगे हम। सभी कहते हैं क्या किया क्या दिया। जीवन अर्पण किया सूची कैसे बनाएं हैं। रिश्तो में क्यों नहीं रही ईमानदारी। सोचते नहीं जो देंगे वही पाएंगे हम। हर तरफ है धोखा लालच और कर्तव्य हीनता। अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे हम। क्यों करते हैं हम उम्मीद दूसरों से। किसी और की उम्मीद कब बन पाएंगे हम। 👉 हमसे जुडने के लिए ...
Kavita,poem,shayari,suvichar Kahani,chutkule