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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Rishte

  रिश्ते  रिश्तो की इस दुनिया को।  कैसे समझे और समझाएं हम।  क्या गलत है और क्या सही।  इसका उत्तर कैसे पाएं हम।  हाथ पकड़ कर कोई ऊपर उठाता नहीं।  टांग खींचने की परंपरा का शिकार है हम।  अहम की दीवार क्यों टूटती नहीं।  मैं और मैं को छोड़ कब बन पाएंगे हम।  स्वार्थ लिप्सा में बंधे हैं सारे रिश्ते।  ऐसे में त्याग को कैसे अस्त्र बनाएं हम।  सभी है परेशान मुझे क्या मिला क्या मिला।  क्या दिया है यह कैसे बताएंगे हम।  अधिकारों को लेकर यहां सभी हैं सजग।  अपने कर्तव्य बोध को कैसे जगायेंगे हम।  एक चेहरे पर लगे हैं कई चेहरे।  असली चेहरे को कैसे पहचान पाएंगे हम।  सभी कहते हैं क्या किया क्या दिया।  जीवन अर्पण किया सूची कैसे बनाएं हैं।  रिश्तो में क्यों नहीं रही ईमानदारी।  सोचते नहीं जो देंगे वही पाएंगे हम।  हर तरफ है धोखा लालच और कर्तव्य हीनता।  अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे हम।  क्यों करते हैं हम उम्मीद दूसरों से।  किसी और की उम्मीद कब बन पाएंगे हम। 👉 हमसे जुडने के लिए ...

Barish

बारिश  तपती धरती पर पड़ी है बारिश की बूंदे।  धरा को करार आ रहा है।  छा गई हैं काली घटाएं।  पेड़ पौधों का जीर्णोद्धार हो रहा है।  भर गए हैं सब ताल तलैया।  मिट्टी की सोंधी महक से प्यार हो रहा है।  छट रहे हैं निराशा के बादल।  मन में आशा का संचार हो रहा है।  चारों ओर हरियाली है छाई।  नवजीवन का व्यापार हो रहा है।  वर्षा बहार के आगमन से।    अन्नदाताओं में हर्ष का त्यौहार हो रहा है।   चल रही है पुरवाई  हवाएं।  सारा उपवन फूलों का हार हो रहा है।    धुल  रही हैं सारी मलिन यादें।  शीतल व स्वच्छ गगन का दीदार हो रहा है।  बदल रहा है मौसम का मिजाज।  पृथ्वी का श्रृंगार हो रहा है   लग रहा है सब कुछ अच्छा अच्छा।  खुशनुमा सा दिल में एहसास हो रहा है। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Vartika Dubey EDUCATION : ADDRESS : Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. ...

Shramik ki majbooriyaan

  श्रमिक की मजबूरिया आओ बताऊँ गरीब श्रमिक की,           कहानी आपको सुनाता हूं!  अपने परिवार की  बोझ को लेकर,  दिन भर तन जलाता है!   एक एक पैसे जोड़-जोड़ कर,          अपना फर्ज निभाता है!   कठोर तपश्या करने पर भी,      क्यों कर्ज तले दब जाता है??  बड़े अधिकारी  अधिकार जमाते,            पल पल जेबे भरते हैं!   क्या लगता है हमे आपको,        मानवता अभी भी बाकी है!   बाल बच्चो की खुशी के खातिर,               अपनी जान गंवाई है!      क्यों भूल जाते इनकी वजह से,           हर पल खुशियाँ पायी है!   सदियो से चली आ रही है,            ताजमहल जिसने बनाये है!   शाहजहां भी अपने स्वार्थ के खातिर,        उनके हाथ कटवायें हैं!  इतना तो मैं समझ गया हूं,    ...
 श्रमिक की मजबूरिया आओ बताऊँ गरीब श्रमिक की,           कहानी आपको सुनाता हूं!  अपने परिवार की बोझ को लेकर,  दिन भर तन जलाता है!   एक एक पैसे जोड़-जोड़ कर,          अपना फर्ज निभाता है!   कठोर तपश्या करने पर भी,      क्यों कर्ज तले दब जाता है??  बड़े अधिकारी अधिकार जमाते,            पल पल जेबे भरते हैं!   क्या लगता है हमे आपको,        मानवता अभी भी बाकी है!   बाल बच्चो की खुशी के खातिर,               अपनी जान गंवाई है!      क्यों भूल जाते इनकी वजह से,           हर पल खुशियाँ पायी है!   सदियो से चली आ रही है,            ताजमहल जिसने बनाये है!   शाहजहां भी अपने स्वार्थ के खातिर,        उनके हाथ कटवायें हैं!  इतना तो मैं समझ गया हूं,       ...

Ektarfa Pyaar

   एकतरफा प्यार दुनिया मे लाखों चेहरे,  पर मैंने एक ही चेहरा पाया!    पर उसका नाम न था न पता,  पर दिल मे एक शुकुन था,  जो मन को मेरा भाया!  अब तो हमे शाम,  शाम ही नही लगती!    अंधेरी रातों मे, उजाला सा लगता है!  ये हवाएं फूलों की खुशबु भी, उनके होने का एहसास दिला रही है!    एकांत बैठा ख्वाबों मे खोया,  टपकती ओश् की बूँदे, मानो आने वाले वर्षा का अनुमान लगा रही है!     उनकी एक झलक न मिलने से ही,  उनकी जुदाई का डर सताने लगी है!     न पाने का, होने वाला शोर मेरे कानों मे गूंजने लगी है!    दिन बीती लम्हें आए लम्हें चले गए,  पर ओ हमें कहीं मिली नही,  अब उनकी आश न थी!      अब हमें ऐसा लगा कि खुली हवाओं में, जिस तारे को हम एकटक निहारते रहे,  ओ टूटकर कहीं जाके विलीन हो गयी थी!      ये हमारा पहला प्यार का पहला एहसास था,  जो विक्षिप्त हो गयी विलीन हो गयी!      उनका एहसास जो सुंदर कांटो की तरह, पूरी काया में चुभ...

Vishwas

 विश्वास ओ नन्हे दीपक जलता रहा, विश्वास बन कर पलता रहा। बस खुद पे तू विश्वास रख ,  विजय का फिर स्वाद ‌चख। विश्वास से ये हो जाएगा , जो ठान लेगा वो पाएगा। जाएगा अंधियारा भी कभी, आएगा उजियारा भी ‌कभी। एक पल ना साहस हारना, हो चाहे जीवन वारना।। तू समय के सीने पे चढ़, हर पल नया प्रतिमान घड़। ये रात भी ढल जाएगी, फिर से प्रभा मुस्काएगी। नव सृजन का उत्साह ‌रख, मन में नयी एक चाह रख। तू पंख आशाओं के लगा, खुद में नया ‌हौसला जगा।  विश्वास संबल है जो तेरा, असंभव भी संभव है यहां।। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Mukta Sharma EDUCATION : ADDRESS : Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।

Gareeb

 गरीब 👉🏻गरीब हूँ तो क्या हुआ अपने हद मे रहिए, किसी को सराहना दे नही सकते तो,अपने मुँह को विराम दीजिये!  वर्षो से हम नमन करते, फिर भी इज्जत गवाइं है,  घर में आपके काम करके, जूठन चावल खाई है!  तेरे घर की इज्जत है तो मेरे घर की क्या इज्जत नही,  क्या हुआ जो महल मे है तु, मेरे घर मे क्या छत नही!  रूखी सूखी खाता हूं फिर भी, लेता हूं मैं प्रभु का नाम!  तकलीफ मे अपनी रहकर भी,  करता रहता तेरा काम!    👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Gajanand Jayanti Kenwat EDUCATION :Bsc maths ADDRESS : Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।

Mera Aagan

मेरा आँगन कविता मेरे घर के आँगन में  दो तरुवरों की धनघोर छाया ।  जब चले समीर पूर्वइय्या  तो लहर-लहर लहराये  जब खिलें फूल कलियन पर  तब सबके मन को भायें सूरज की किरणों ने फिर मोती चमकाया - - - - - - मेरे - - - - - - - - - -  सुबह शाम तीनों पहर  देखा करती मेरी नजर चिडियों के चहचहाने की आवाज करती मुझको वो तरोताज मेहंदी की डाली पर बैठकर बुलबुल मेरे ने गीत गाया मेरे - - - - - - - - - -  है कन्नोर भी बड़ा महान है उसकी भी अपनी शान प्रभु के चरणों में अर्पण को सजाता पीत पुष्प रमणीयमान भयी बावरी देखकर अदभुद सुख बरसाया ।  मेरे- - - - - - - - -  👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Tamanna Kashyap EDUCATION : ADDRESS : Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो...

Moorkh

 मुर्ख 'मुर्खो' का कभी निरादर मत कीजिये, क्योकिं हम जिस जगह पे है ,शायद उन लाखों करोडो मुर्खो की वजह से है, अगर मुर्ख नहीं होते तो हम उस मुकाम के लायक नही रहते, जो हमने कड़ी मेहनत से पायी है या पाना चाहते हैं!                👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Gajanand Jayanti kenwat EDUCATION :Bsc(Maths)  ADDRESS : Dabhara janjgir champa Chhattisgarh Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।

Pati Patni Samvaad

  पति-पत्नी संवाद  (सत्य घटना) पति:- माँ की तबियत खराब है आज तुम छुट्टी लेलो। पत्नी:- नहीं मेरी क‌ई छुट्टियाँ हो चुकी हैं। इस बार छुट्टी तुम लेलो। पति:- मै छुट्टी कैसे ले सकता हूँ कल मेरी जरूरी बैठक है। पत्नी:- बैठक में तुम्हारे सहकर्मी शामिल हो सकते है। तुमने लम्बे समय से कोई छुट्टी ली भी नहीं है। तुम्हें मिल भी जाएगी। पति:- दफ्तर में काम का बहुत दबाव है, मुझे छुट्टी नहीं मिलेगी, तुम छुट्टी लेलो। पत्नी:- नहीं! पिछले हफ्ते बबलू की तबियत खराब हुई थी, तब मेरी तीन छुट्टियाँ हो ग‌ईं। काम का दबाव बढ़ जाता है बाॅस भी उखड़ते हैं। मैं छुट्टी नहीं ले सकती। पति:- छुट्टी तो तुम्हें लेनी पड़ेगी! पत्नी:- क्यों? पति:- क्योंकि ये तुम्हारा फर्ज है तुम इस घर की बहू हो। पत्नी:- और तुम्हारा "फर्ज अपने माता-पिता के लिए क्या कुछ भी नहीं है।" पति:- है, है ना लेकिन माँ बीमार है इसलिए, पिता बीमार होते तो देखभाल कर लेता! लेकिन माँ... पत्नी:- माँ है तो क्या हुआ डाॕक्टर के पास दिखाने ही तो ले जाना है। पति:- सिर्फ डाॕक्टर को दिखाने ही कहाँ, माँ को बार-बार शौचालय भी तो ले जाना होता है। पत्नी:- तो इस...

Chitthi

  चिट्ठी (कविता)  लिख कर चिट्ठी भेज रही हु भगत सिहं तुझे बुलाने को ,  1 बार फिर आ जाओ अपना देश बचाने को ।  छोटे छोटे बच्चे भुखे रोते रोज सीमा पर शहीद सैनिक होते  भारत मॉं पर हमले पाक चीन के होते  देश हथियाने को ,  आ जाओ अपना देश बचाने को।  रोज नए नए गठबन्धन होते नए नए नेताओ के संगम होते ,  गद्दार सब काले धन पर सोते आराम फरमाने को ,  आ जाओ अपना देश बचाने को ।  ना एकता लोगो मे आयी, भाई ने भाई की जान गवायी ,  और सरकार ने करवाई लडाई दंगे भडकाने को ,  आ जाओ अपना देश बचाने को ।  गरीबो का होता शोषण हो रहा अमीरो का पोषण ,  सरकार दे रही झूठा भाषण वोट बनाने को ,  आ जाओ अपना देश बचाने को ।  हम भारत के वासी हमारा ना ईश्वर ना कैलाशी ,  सब कुछ बस भारत मॉँ कहलाती ,  आ जाओ पाक चीन का दिल दहलाने को,  आ जाओ अपना देश बचाने को ।  ये देश ही मेरी पूजा है, भगवान है ,  शबगा है गाँव मेरा और भारती मेरा नाम है ,  मै प्रेम भाव से लिखू कविता ,  भारत के सपने नये सजाने को ,  आ जा...

Khi door

कहीं दूर कविता    कहीं दूर से आयीं वो पुरानी सी विरासते  यादों को लम्बी परछाईयां बस गयी मेरे आगंन  घर के कोने-कोने कि जिस दीवार जिस पेड को देखूं मानो जग पड़ते हो फिर से वो गुजर जीये हुए सारे लम्हें हंसते खेलते दिनों से रात को तन्हाईयों के  वो सारे सफर कितना अच्छा था वो रोज घर से निकलना एक आवारा पाथिक के जैसे  एक नव वटप के जैसे जिसे की अभी ये करना है कि  किस किस्म के फूल पत्ते फल आये उसकी देह रूपी शाखों पर  रोज नया सफर एक नयी आशा ले चल गुजरता और रोज लौटता थककर रात के अंधेरे माँ सा दुलार दे सुला दे पीकर थकन सारी ताकि फिर एक नयी  सवेर के साथ जागूं  ऊर्जा से संचारित हो भरकर और फिर भागूं उस आने वाले कल की  प्यास में, तलाश में रोज धूप जिस्म के छिद्रों से अन्दर का पानी  खिंचकर बहा देती पसीना बनाकर  तो ठण्डी हवा भी कभी कभी आ जाती  सहलाने मन कहीं से कि टूट ना जाए मन के हौसले  मौसमी इन प्रहारों से और वक्त मानो राज गणना करवाता कि आज मुझे खोकर तेरा हासिल क्या है यही सिलसिला भौर के साथ रोज जगता सांझ को थकता रात की गोद में...

Pita

पिता कविता विचित्र मन की छवि पिता हैं !! आसमान में रवि पिता हैं!! मांँ हैं शीतल छांव अगर तो  धूप में जलती चिता पिता हैं!! मांँ हैं मन का सम्मान अगर तो, जीवन का आधार पिता हैं!! बहुत सुनी मांँ की गाथा मगर ,, जो टुटकर भी लिपट कर ना रो पाएं   वो एक ऐसा इंसान पिता हैं!! मां हैं अगर परवाह संतान की तो,, सबसे बड़ा चौकीदार पिता हैं !! शब्द मेरे निशब्द हैं मगर  अंतर्मन की परिभाषा में मां अगर हैं अन्नपूर्णा घर की तो,, खेत में चलता वो हल पिता हैं !!  मांँ हैं अगर ममता की मूरत  तो,, उस मूरत का श्रृंगार पिता हैं!! 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Brijesh kawar EDUCATION : ADDRESS :Kota, Rajasthan Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 प...

Jane kitne chand

जाने कितने चांद  कविता  जाने कितने चांँद उतरे ,  जाने कितनी रातें बीती,  नित जागे कितने सूरज ,  आयीं कितनी सुबहें रीती, शाखों के पल्लव सूखे भाव चेतन मूर्त पडा,  प्यास उठी तो धूप मरू सब जड सा हो पडा चोकट बैठे चक्षु हारे फिर किसने बाजी जीती किसने जलाकर दीपक हवा को आवाज लगायी जो जला उजाले को उसने बस्तियां जलायी बेरंग दीवारों के जीवन स्वास टूट टूट कर जीती नवनिर्माण की नींव कैसी जिसमें जीवन की तुच्छता सत्ता रूपी नाग विषैला  नित मानवता को डसता नष्टता की चोकट पर राज कैसी अघात अस्त्र सी नीति।  👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Ravi Lashkry EDUCATION : ADDRESS : Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।

Kisi ne kaisi aag lagai

    किसी ने कैसी आग लगाई (कविता)  इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है कैसे बिछड रहे रिश्ते कैसी हुई रूसवाई है किसी मॉ का बेटा गया पिता ना उसकी लाश देख पाया है किसी के सिर से उठ गया पिता का ही साया है किसी बेटे की मॉ गयी किसी बहन का बिछडा भाई है इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है किसी का रह गया सपना अधूरा किसी का छिन गया रोजगार किसी का कोई अपना गया किसी का चला गया पूरा ही परिवार किसी का मिटा सिन्दूर. कोई मुश्किल से अपना सुहाग बचा पाई है इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है जो बचपन था खिलखिला के हंसने वाला  उसके भी मुह से छीन लिया इस चिंगारी ने निवाला उस नौजवान मे भी हुई हवा की कमी जिसमे आज ही जवानी आई है इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है कल ही तो आया था पतझड आज बंसत को कहॉ छोड दिया अभी तो मानव सम्भला भी न था जो फिर से तोड दिया लगता है जहर की पूरी बोतल इस हवा मे मिलाई है इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है जो आज ही पैदा हुआ वो कैसे रिश्तेदारो को जानेगा रिश्ते नातो को कैसे वो मानेगा आज कुछ भी ना भारती शबगेवाली समझ पाई है इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है 👉 ह...

Kismat

    किस्मत   कविता कितना भी पढ़ लो हाथों में, लिखी वही तहरीर। कोशिश करलो वही मिलेगा, जो लिखा है लकीर।। अच्छे घर में रिश्ता हो गया, पढ़ा-लिखा परिवार। बेटी किस्मत बहुत भली है, प्राणी हैं कुल चार।। शादी मंडप सजा हुआ है, चारों ओर बहार।  शहनाई धुन कर्ण में गूँजे, होते मंगल चार।।  समय हो गया है फेरों का, दुल्हन है तैयार।  दूल्हा-दुल्हन फेरे ले रहे, खुशियों की बौछार।।  शादी की सब रस्में हो गईं, रहे विदा में देर। आस-पास का देख नजारा, दी दूल्हे को टेर।।  दूल्हे के सब साथी आए, इधर-उधर से घूम।  सामने एक ताल दिख गया, रहे खुशी में झूम।।  विचार नहाने का बनाया, गए ताल में कूद।  गहरे पानी दूल्हा आया, आँख दंभ से मूंद।।  यारों का भी ध्यान नहीं था, रहे मस्ती में चूर।  चींख सुनाई दी दूल्हे की, डूब रहा था दूर।।  उसे बचाने की कोशिश की, पहुँच न पाए पास।  लोग बहुत से दौड़े आए, कूदे बचाव आस।।  घराती बाराती आ गए, सबकी निकले जान। अफरा तफरी देर हो गई, बच ना पाए प्रान।।  बस्ती हा-हाकार मच गया, दुल्हन हुई बेहोश।  दुल्हन प...

Vatavaran

  वातावरण (कविता)   यह कैसा हो गया है वातावरण।  पता नहीं कब है जीवन और कब मरण।  दिग्भ्रमित हो गया है हर इंसान।  हर कोई दिख रहा है हैरान।  किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रहे हैं सब।  पता नहीं क्या करें और कब।  सभी के टूटे हुए हैं मनोबल।  कैसे हो यह समस्या हल।  बच्चों के चेहरे हैं मुरझाए।  क्या करें कि वह खिल खिलाए।  वातावरण में छाई है निराशा।  हर ओर दिख रहा है कुहासा।  हम ही हैं इसके लिए उत्तरदाई।  हमने खुद अपनी आजादी गवाई।  सरकारों के सहारे क्यों हैं हम।  हम क्यों नहीं करते अपना उद्यम।  थोड़ा सा संयम थोड़ी सुरक्षा।  तभी हो पाएगी हमारी रक्षा।  बढ़ाएं हम अपनी रचना शक्ति।  कुछ करें नया हो जाए प्रशस्ति।  घर का वातावरण हो प्रफुल्लित।  हम सभी हो जाएं उत्साहित।  फिर एकबार हिम्मत जुटाए हम।  अपने भविष्य के सपने सजाए  हम।  कमर कस लो हो जाओ तैयार।  फिर हमें जीतना है एक बार। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Vartika Dubey EDUCATION...

Mahamari

  महामारी   कविता कैसी महामारी का ये प्रकोप छाया है। मिलती यारी रिश्तेदारी अब डर का कहर लाई है। न अपनों से नहीं मिलने देती यह महामारी । सड़को की वो भीड़ अब शमशानों में ले आई । बच्चे - बूढे़ - जवानों की लाशों ने शमशानों में । यू मौत का तांडव लगाया है। शमशानों की धरा भी अब रोती आ चली है। कुंभ लग आया है शमशानों में। रोते - रोते आँखों में मोती बह आऐ है। धरा की हरियाली भी अब रंगहीन हो आई है। किसी के बहन का यह भाई इस महामारी में खोया है। छीना किसी बहु ने सुहाग इस महामारी में। आज भयभीत हुई धरा भी रोती चली आई है। कैसी दहशत लाई यह महामारी। मौत का पैगाम लाई यह महामारी । हँसते - खिलते खलयानों को रक्ताभ बना डाला इस महामारी ने। रक्ताभ सेभरी धरा ने आज तबाही की दहशत लाई है। रोती,बिलकती धरा के मोती की बूँदों ने। कहीं गगन को बरसने को मजबूर दिया है। आज गगन , प्रकृति रोती है। इस महामारी की दहशत से। आशाएँ खो डाली जीने की आज हमनें इस महामारी में     👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Rahul Bhatt EDUCATION : ADDRESS :Uttrakhand Publisher Om Tripathi ...

Dekho Aaya fir Corona

  देखो आया फिर कोरोना ,  कविता  देखो आया फिर कोरोना,  लाया फिर भय का डेरा।  इस बार आया बहुत विकट रुप में,  देखो आया फिर कोरोना।  इसको फिर लाने की जिम्मेदारी,  हर उस वयक्ति की है,  जिसने वरती लपरवाही,  देखो आया फिर कोरोना।  हमने इससे लडने के सारे हथियार छोड़ दिये थे,  न हम ने सोशल डिस्टेंसिंग रखी  न हमने मास्क लगाया देखो आया फिर कोरोना।  उसने जान लिया था अब नहीं है मेरा डर,  वह निकला चालाक देखलो,  उसने चुपके, चुपके अपने पैर जमाए,  और लगा लिया भारत को अपने पीछे,  आज देख लो लपरवाही का अंजाम देखो आया फिर कोरोना,  देखो आया फिर कोरोना। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Reetu Raghuvanshi EDUCATION : ADDRESS :Jabalpur, M. P Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Socia...

Ye paisa

  ये पैसा  ( नेहा की डायरी से)  _यें पैसा क्या क्या नहीं कराता हैं_ तासीर ही कुछ ऐसी हैं इस पैसे की साहब ! हर मन में लोभ आही जाता हैं!! कभी चोरी कभी कत्ल कभी बंटवारे कराता हैं सच हैं यें पैसा क्या क्या नहीं कराता हैं!!.... मिनीस्टरों से भी ऊंची पहुंच हैं साहब इसकी  यें अदालत में झुठ को सच्च और सच्च को झुठ कराता हैं!! हां यें सच्च ही हैं साहब यें पैसा क्या क्या नहीं कराता हैं!....... बन जाते हैं रिश्र्वत से हर काम और कहीं नयें रिश्ते भी बनाता हैं ! मान गयें साहब यें पैसा क्या क्या नहीं कराता हैं!!..... 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Brijesh Kawar EDUCATION : ADDRESS :Kota, Rajasthan Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं। Social Media Manager Shourya Paroha अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क कर...

Maa

मांँ (कविता)   मांँ शब्द कोई क्या करेगा परिभाषित।  मांँ शब्द में पूरी दुनिया है समाहित।  मांँ ही है संपूर्ण सृष्टि।   खुशनसीब है वो जिसे मिले मां की दृष्टि।  मांँ ने बच्चों पर अपना सारा जीवन वार दिया।  पर बच्चों ने क्या मां को अपने हिस्से का प्यार दिया।  मांँ होती है ममता की मूरत।  मांँ है दुनिया में सबसे खूबसूरत।  मांँ से ही है बचपन , प्यार और दुलार।   मांँ तो माने बच्चों की हर मनुहार।  मांँ ने किए अपने सारे सुख समर्पित।  मांँ को कभी भी ना करें अपमानित।  मांँ के लिए क्या कर पाएंगे हम।  मांँ के ऋण कैसे चुकाएंगे हम।  अब तो जगा लो अपना जमीर।  जिसके पास मां है वह सबसे अमीर।  रिश्ते की बगिया में मांँ है गुलाब।  सभी तारों के बीच में मांँ आफताब। 👉 हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें 👈 Poet Vartika Dubey EDUCATION :M.a, B. Ed ADDRESS :Phulpur, Prayagraj Publisher Om Tripathi Contact No. 9302115955 आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते...