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Shramik ki majbooriyaan

 श्रमिक की मजबूरिया


आओ बताऊँ गरीब श्रमिक की, 

         कहानी आपको सुनाता हूं! 

अपने परिवार की  बोझ को लेकर, 

दिन भर तन जलाता है! 


 एक एक पैसे जोड़-जोड़ कर, 

        अपना फर्ज निभाता है! 

 कठोर तपश्या करने पर भी, 

    क्यों कर्ज तले दब जाता है?? 


बड़े अधिकारी  अधिकार जमाते,

           पल पल जेबे भरते हैं! 

 क्या लगता है हमे आपको, 

      मानवता अभी भी बाकी है! 


 बाल बच्चो की खुशी के खातिर,  

            अपनी जान गंवाई है! 

    क्यों भूल जाते इनकी वजह से,

          हर पल खुशियाँ पायी है! 


 सदियो से चली आ रही है,   

        ताजमहल जिसने बनाये है! 

 शाहजहां भी अपने स्वार्थ के खातिर,

       उनके हाथ कटवायें हैं! 


इतना तो मैं समझ गया हूं, 

     मानवता अब न आयेगी! 

 गरीब मजदूर पेट के खातिर,

        अपनी जान गंवाएगी! 


       *✍🏻Wrritten by gajanand jayanti kenwat(gajju)*

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