वातावरण
(कविता)
यह कैसा हो गया है वातावरण।
पता नहीं कब है जीवन और कब मरण।
दिग्भ्रमित हो गया है हर इंसान।
हर कोई दिख रहा है हैरान।
किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रहे हैं सब।
पता नहीं क्या करें और कब।
सभी के टूटे हुए हैं मनोबल।
कैसे हो यह समस्या हल।
बच्चों के चेहरे हैं मुरझाए।
क्या करें कि वह खिल खिलाए।
वातावरण में छाई है निराशा।
हर ओर दिख रहा है कुहासा।
हम ही हैं इसके लिए उत्तरदाई।
हमने खुद अपनी आजादी गवाई।
सरकारों के सहारे क्यों हैं हम।
हम क्यों नहीं करते अपना उद्यम।
थोड़ा सा संयम थोड़ी सुरक्षा।
तभी हो पाएगी हमारी रक्षा।
बढ़ाएं हम अपनी रचना शक्ति।
कुछ करें नया हो जाए प्रशस्ति।
घर का वातावरण हो प्रफुल्लित।
हम सभी हो जाएं उत्साहित।
फिर एकबार हिम्मत जुटाए हम।
अपने भविष्य के सपने सजाए हम।
कमर कस लो हो जाओ तैयार।
फिर हमें जीतना है एक बार।
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Publisher
Om Tripathi
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Shourya Paroha


Aaj Ke parivesh ko darshati hui rachna
जवाब देंहटाएंVery Nice
Bahut achha likh rhi ho tum..very nice👏👏
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