मेरा आँगन
कविता
मेरे घर के आँगन में
दो तरुवरों की धनघोर छाया ।
जब चले समीर पूर्वइय्या
तो लहर-लहर लहराये
जब खिलें फूल कलियन पर
तब सबके मन को भायें
सूरज की किरणों ने फिर मोती चमकाया - - - - - -
मेरे - - - - - - - - - -
सुबह शाम तीनों पहर
देखा करती मेरी नजर
चिडियों के चहचहाने की आवाज करती मुझको वो तरोताज
मेहंदी की डाली पर बैठकर बुलबुल मेरे ने गीत गाया
मेरे - - - - - - - - - -
है कन्नोर भी बड़ा महान
है उसकी भी अपनी शान प्रभु के चरणों में अर्पण को
सजाता पीत पुष्प रमणीयमान भयी बावरी देखकर अदभुद सुख बरसाया ।
मेरे- - - - - - - - -
👉हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें👈
Publisher
Om Tripathi
Contact No. 9302115955
आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं।
आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं।
Social Media Manager
Shourya Paroha
अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप
नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
हमें बताएं आपको यह कविता कैसी लगी।