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Mera Aagan

Hindi poem

मेरा आँगन

कविता

मेरे घर के आँगन में

 दो तरुवरों की धनघोर छाया ।

 जब चले समीर पूर्वइय्या

 तो लहर-लहर लहराये

 जब खिलें फूल कलियन पर 

तब सबके मन को भायें

सूरज की किरणों ने फिर मोती चमकाया - - - - - -

मेरे - - - - - - - - - - 


सुबह शाम तीनों पहर

 देखा करती मेरी नजर

चिडियों के चहचहाने की आवाज करती मुझको वो तरोताज

मेहंदी की डाली पर बैठकर बुलबुल मेरे ने गीत गाया

मेरे - - - - - - - - - - 


है कन्नोर भी बड़ा महान

है उसकी भी अपनी शान प्रभु के चरणों में अर्पण को

सजाता पीत पुष्प रमणीयमान भयी बावरी देखकर अदभुद सुख बरसाया । 

मेरे- - - - - - - - - 

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