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Jane kitne chand

जाने कितने चांद 

कविता

 जाने कितने चांँद उतरे , 

जाने कितनी रातें बीती, 

नित जागे कितने सूरज , 

आयीं कितनी सुबहें रीती,

शाखों के पल्लव सूखे

भाव चेतन मूर्त पडा, 

प्यास उठी तो धूप मरू

सब जड सा हो पडा

चोकट बैठे चक्षु हारे

फिर किसने बाजी जीती

किसने जलाकर दीपक

हवा को आवाज लगायी

जो जला उजाले को

उसने बस्तियां जलायी

बेरंग दीवारों के जीवन

स्वास टूट टूट कर जीती

नवनिर्माण की नींव कैसी

जिसमें जीवन की तुच्छता

सत्ता रूपी नाग विषैला 

नित मानवता को डसता

नष्टता की चोकट पर राज

कैसी अघात अस्त्र सी नीति। 

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Poet

Ravi Lashkry

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Hindi poet



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Om Tripathi

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