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परिवार विघटन

_आधुनिक एकल परिवार विघटन



 
आज हमारे सामने एक ऐसे समाज की तस्वीर सामने आती है  जहां  परिवार  और  घर जैसे शब्द विलुप्त होते जा रहें हैं ।आज की पीढ़ी में  आत्मनिर्भर बनने के साथ -साथ ,माता-पिता, भाई -बहन ,पति- पत्नी ,सभी निजी संबंधों  में  निजता की कमी  देखने को मिलती है ।आज  के समय में  अस्तित्ववाद अहम भूमिका निभा रहा है  लेकिन  अनेक विसंगतिया भी दिखाई दे रही है जैसे आजकल गाव् लड़की भी नौकरी पर जाने लगी है  जिससे पति पत्नियों के बीच  अहं की भावना के कारण दाम्पत्य जीवन  में   भी अनेक कठिनाई हो गयी है। इस   वैश्विकरण का प्रभाव सबसे ज्यादा ग्रामीण समाज पर अधिक दिखाई दे रहा है ।ग्रामीण लड़की और लडके  एक  शहरी जीवन जीते  है  जिससे उसका  परिवार और  समाज के साथ तालमेल स्थापित नही हो पाता जिससे समाज उसे   गलत तरीके से देखने लगता है  ना तो वह  शहरी बन पाता  है और ना ही  ग्रामीण । आगे बढ़ने की होड़ में  वह कुंठा से भर जाता है। जिससे परिवार और  घर  से अनमना रहता है  ओर अवसाद ग्रसित हो जाता है जिससे परिवार और  एकल परिवार भी विघटित  होते नजर आ रहे है ।वह अपना सम्पूर्ण खाली समय सोशल मीडिया पर ही व्यतीत करता है  और आज  प्रत्येक व्यक्ति एक परिवार एक फोन पर सीमित हो गया हैओर परिवार व्यक्तिगत में  मिलता नजर आ रहा है ।

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Poet

 कुमारी भारती त्यागी

EDUCATION :
ADDRESS :पिलाना, बिजनौर







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Ummeede

_   उम्मीदें उम्मीदें इस जहाँ में बस ख़ुदा से रखना तुम साबरी इंसान कभी किसी के साथ वफ़ा नहीं करते। जो क़ैद कर ले किसी को अपनी यादों में, तो मरने तक उनको उस यादों से रिहा नहीं करते। रूह से इश्क़ करना ये बस ख़्वाबों-ख़यालों  फिल्मों में सुन रखा होगा सबने, हक़ीक़त में इस जहाँ में लोग बिना जिस्म के इश्क़ का सौदा नहीं करते। वादे करके भूल जाना तो इंसान की फ़ितरत है। यहाँ वादे ख़ुदा से भी करके लोग पूरा नहीं करते। ~ Drx Ashika sabri (Age: 22) Bsc ,D pharma Varanasi(U.P)

Shiv Shakti

_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥ शिवालयों से शंखनाद हुआ,  गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन,  शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन,  और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव,  काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें,  संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति  हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो,  जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता,  काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका,  अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है,  जो त्याग और तप का है ज्ञान। ~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

Sannata

_  विरह का सन्नाटा सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। ~ बाल कृष्ण मिश्रा,    नई दिल्ली