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Maa


माँ 



मेरी मां, सायर मां तुझे सादर प्रणाम,
तेरी कृपा से ही हमने पाया हर मुकाम,

याद नही कैसी दिखती थी मेरी मां,
सुना है, लाखों में एक थी मेरी मां,
कितना करती थी प्यार मुझे मेरी मां,
शायद, अपने से भी ज्यादा चाहती थी मेरी मां।

हमसफर बन पिता के हर धर्म निभाती थी मां,
ढाल बन, पिता के संग खड़ी रहती थी मां,
सब की खुशहाली के लिए जीती थी मां,
दुख सहकर भी मुस्कराती रहती थी मेरी मां।

बच्चों का पालन - पोषण, सहर्ष करती रही मां,
किसी पर भी आंच नहीं आने देती थी मां,
खुद रोकर भी हमे हंसाती थी मां,
हर मुश्किलों को आसान कर देती थी मेरी मां।

काश आज तू हमारे साथ होती मां,
उम्र के पड़ाव में पिता के साथ होती मां,
चंदा सी चांदनी देती मां,
मधु सी मधुरता देती मां,
कांता सी सुंदरता देती मां,
संतोष सी संतोषी बनाती मां,
विजय सी विजेता बनाती मां,
जसवंत सा जस देती मेरी मां।

दूर रहकर भी बस यूं ही मार्ग प्रशस्त करते रहना,
चाहे ख्वाबों में ही सही, रोज जागते रहना,
अब तक तो निभाया है, आगे भी निभाते रहना,
हर सुख में शरीक रहना, हर दुख में हिम्मत देना,
जिंदगी के हर मुकाम पर आपका साथ रखना।

(मन के बोल - विजय सिंह जागावत)


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Poet

 Vijay singh Jagawat

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Publisher

Om Tripathi

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