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Mera Kabootar

 

_मेरा कबूतर




एक दिन सावन की बात निराली बारिश में भीगी मेरी पीली साड़ी
भीगा बदन भीगा तन मन और भीगा मेरा आंचल और भीग गए वो दाने मैने जो कबूतर के लिए डाले
आता था बस मुझे देखने और खाने वो दाने बारिश हुई वो आ नही पाया दाना पानी कुछ खा नही पाया आज उम्मीद टूट गया है वो भी मुझसे रूठ गया है कलरव उसका मै सुन नही पाई इसी चिंता में नीद गवाई न जाने वो कैसा है भूखा है प्यासा है कैसा है सुना करके मेरा घर आंगन न जाने वो कैसा है पागल
दिल लग गया है जिससे उसे प्यार कहते हैं एक दिन वो आएगा दाना पानी कुछ खाएगा मुझे गले लगाएगा और थपकी देकर मुझे गहरी नींद सुलाएगा


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Poet

Amrita tripathi

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Om Tripathi

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