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Hava hu Mein

 

_हवा हूं मैं

Kavi Amrita Tripathi



मैं चौराहे से गुजरी तुम्हारे बालों को चूमती हुई अपने आप में झूमती हुई
बगीचे में गई फूलों को झकझोरा लताओं के मन में बोला नदी तालाबों झीलों नहरों खेत खलिहानों हर जगह गई पर मन न भरा
मंदिर में पुजारी के कपड़े उड़ाए मंदिर का घंटा धीरे से बजा आए मै आग में घी का काम करू अपनी अंगड़ाई से जन घन नाश करू
क्रोध करू तो सृष्टि हिला दू
शांत रहे तो पसीने बहा दू
जिधर चाहती हूं उधर घूमती हूं कहीं भी पता ठिकाना नहीं
सब कुछ करने में सक्षम हूं फिर भी कहीं न कहीं बैचेन हूं
क्योंकि मैं हवा हूं एक जगह रहती नही अपने घुन में बहकती रही


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Poet

Amrita tripathi

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Om Tripathi

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