किसी ने कैसी आग लगाई
(कविता)
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
कैसे बिछड रहे रिश्ते कैसी हुई रूसवाई है
किसी मॉ का बेटा गया पिता ना उसकी लाश देख पाया है
किसी के सिर से उठ गया पिता का ही साया है
किसी बेटे की मॉ गयी किसी बहन का बिछडा भाई है
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
किसी का रह गया सपना अधूरा किसी का छिन गया रोजगार
किसी का कोई अपना गया किसी का चला गया पूरा ही परिवार
किसी का मिटा सिन्दूर. कोई मुश्किल से अपना सुहाग बचा पाई है
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
जो बचपन था खिलखिला के हंसने वाला
उसके भी मुह से छीन लिया इस चिंगारी ने निवाला
उस नौजवान मे भी हुई हवा की कमी जिसमे आज ही जवानी आई है
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
कल ही तो आया था पतझड आज बंसत को कहॉ छोड दिया
अभी तो मानव सम्भला भी न था जो फिर से तोड दिया
लगता है जहर की पूरी बोतल इस हवा मे मिलाई है
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
जो आज ही पैदा हुआ वो कैसे रिश्तेदारो को जानेगा
रिश्ते नातो को कैसे वो मानेगा
आज कुछ भी ना भारती शबगेवाली समझ पाई है
इस मुल्क मे किसी ने कैसी आग लगाई है
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Publisher
Om Tripathi
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Shourya Paroha


Bahut sundar....... keep it up
जवाब देंहटाएंThank u
हटाएंThank u
हटाएंThank u
हटाएंBoht boht bdhya... Well done bharti ji.. keep it up ... U r inspiration for us
हटाएंKeep it up ...😀😀
जवाब देंहटाएंHeart touching 😊😊