प्रकृति का उपहार है ये,
मर्यादाओं की है आन ,
ममता की मूरत है वो ।
नारी देश का स्वाभिमान ।
पग रखे जिस भवन में,
बन जाये मंदिर के समान
वनिता की महिमा वेदों ने कही,
नारी गृहलक्ष्मी का वरदान ।
नारी- - - - - - - - -
करती कुलों को उजागर ये,
दीपक में ज्योति के समान,
सौन्दर्य प्रतिमा का स्वरूप,
गुणों से है जिसकी पहचान ।
नारी देश- - - - - - -
त्याग और बलिदान की है स्वामिनी,
समाज में जिसकी ऊँची शान,
धन्य है ये धरा जिससे,
उस नारी को शत-शत प्रणाम।
नारी देश- - - - - - -
Written by
Rajparapur, Sitarpur
(U.P)
Posted by
Om Tripathi


Very nice dear👌👌👌😊
जवाब देंहटाएं