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_ मैं बेचारा तन्हा अकेला 









मैं बेचारा तन्हा अकेला
भीगी राहों पर
ढूँढ रहा, खुद को, कहीं |
सड़कें भीगीं, शहर धुंधला,
आसमान में घना कोहरा |
भीगे आँखों से छलके
यादों की धार,
हर बूँद में गूँजे तेरा प्यार।
शहर की भीड़ में, मैं खुद से पूछता,
अपनी परछाई से ही अब मैं रूठता।
पत्थरों में चमक, पर दिल में अँधेरा,
टूटे सपनों सा लगता जीवन |
खोया है कुछ, या पाया सवेरा?
मैं मुस्कुराता नहीं मगर,
हार भी मानता नहीं |
सपनों की राख से,
गढ़ता कोई सितारा।

 ~ बाल कृष्ण मिश्रा



Address: Bal Krishna Mishra         
Flat No. 253, Ground Floor,
Shri Krishna Apartment, J-2, Sector: 16,
Rohini: 110089, New Delhi.
         

टिप्पणियाँ

  1. बेनामी3:50 pm

    यह कविता अकेलेपन, खोए हुए प्यार और जीवन के संघर्षों को बहुत खूबसूरती और गहराई से बयाँ करती है। इसमें दुख है, लेकिन हार न मानने का दृढ़ संकल्प भी है।

    यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपने अकेलेपन और उदासी के बावजूद, जीवन में आगे बढ़ने और नई उम्मीद जगाने का प्रयास कर रहा है।
    🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी3:52 pm

    कविता का भावार्थ:
    अकेलापन और उदासी: कवि खुद को "बेचारा तन्हा अकेला" महसूस कर रहा है, जो "भीगी राहों" (जीवन की मुश्किल और उदास यात्रा) पर खुद को ढूंढ रहा है। शहर और मौसम का उदास माहौल (भीगी सड़कें, धुंधला शहर, घना कोहरा) उसके मन की स्थिति को दर्शाता है।
    यादें और प्यार: उसकी भीगी आँखें बीते हुए प्यार की यादों से भरी हैं। हर आँसू में उस प्यार की गूंज है, जो अब खो चुका है।
    खुद से अलगाव: भीड़ भरे शहर में भी वह अकेला है, खुद से सवाल करता है और यहाँ तक कि अपनी परछाई से भी रूठ जाता है।
    संघर्ष और आशा: उसका जीवन टूटे सपनों जैसा लगता है। पत्थरों में चमक है, पर दिल में अँधेरा है। इन सब निराशाओं के बावजूद, वह हार नहीं मानता है।
    पुनरुत्थान की इच्छा: अंत में, वह "सपनों की राख" से एक नया सितारा गढ़ने की बात करता है, जो यह दिखाता है कि वह अपनी निराशा को आशा में बदलने और जीवन को फिर से शुरू करने के लिए दृढ़ संकल्पित है।
    यह एक मार्मिक और प्रेरणादायक कविता है।

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