सास-बहू सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सास-बहू

 

वर्तिका दुबे Ma B.ed from Allahabad university

सास-बहू का किस्सा है बहुत ही अजीब।
कभी है बहुत दूर कभी दिल के करीब।
बहुतो ने लिखा पढ़ा है और व्यंग बनाये है।
आज इस रिश्ते पे कुछ हम भी लेकर आए है।
सास-बहू का नाम सुनते ही छवि मन मे आती है।
एक क्रूर और एक निरीह स्त्री का स्वरूप दिखलाती है।
पुरूष क्या कम पड़ गये जो नारी,नारी का दुशमन बन बैठी।
वो सास बनकर बहू की अग्नीपरिक्षा ले बैठी।
अपने समय को याद करो जब तुम बहु बन कर आयी थी।
क्या इक्छा क्या आकांक्षा तुम अपने मन मे लायी थी।
थोड़ा सम्मान तोड़ा प्यार तोड़ा स्थान ह्रिदय व मन मे।
इसके अलावा क्या और कोई लालसा थी मन मे।
अब वही सब तुम अपनी बहु को क्यो नही दे पाती हो।
क्यो उसके साथ तुम फिर वही अन्याय कर जाती हो।
जब मा डांट सकती है तो सास के टोकने मे क्या बुराई है।
जब बेटी के नखरे उठा लो तो बहु को समझाने मे क्या ढीलाई है।
जैसा बेटी के लिये चाहते हो वैसा बहु से व्यवहार करो।
कुछ तो अपनी सोच व परम्पराओ मे सुधार करो।
यदि सास जरा सा भी माँ का रूप ले पाएगी।
तो बहू पुरी तरह समर्पित बेटी बन जाएगी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Ummeede

_   उम्मीदें उम्मीदें इस जहाँ में बस ख़ुदा से रखना तुम साबरी इंसान कभी किसी के साथ वफ़ा नहीं करते। जो क़ैद कर ले किसी को अपनी यादों में, तो मरने तक उनको उस यादों से रिहा नहीं करते। रूह से इश्क़ करना ये बस ख़्वाबों-ख़यालों  फिल्मों में सुन रखा होगा सबने, हक़ीक़त में इस जहाँ में लोग बिना जिस्म के इश्क़ का सौदा नहीं करते। वादे करके भूल जाना तो इंसान की फ़ितरत है। यहाँ वादे ख़ुदा से भी करके लोग पूरा नहीं करते। ~ Drx Ashika sabri (Age: 22) Bsc ,D pharma Varanasi(U.P)

Shiv Shakti

_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥ शिवालयों से शंखनाद हुआ,  गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन,  शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन,  और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव,  काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें,  संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति  हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो,  जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता,  काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका,  अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है,  जो त्याग और तप का है ज्ञान। ~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

Sannata

_  विरह का सन्नाटा सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। ~ बाल कृष्ण मिश्रा,    नई दिल्ली