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(सुहानी बरखा)

झड़ी पे झड़ी आई सावन की घड़ी,
कहे को री मन तरसा,
आई रेआई सुहानी बरखा।
दादूरों ने मेघों को पैगाम भेजा,
धानो को अमरत्व की बूंदें देजा,
सुनकर गुहार की पुकार बदल गरजा।
आई री आई....................
हरी हरी प्रकृति में समा जाने को जी चाहता,
पाकर वर्षा की बूंदें,
पत्ता पत्ता सजीव हो जाता,
धरती का हर कोना _कोना,
असंख्य बूंदों से सिंचित कर जा।
आई री आई.....................

Written by Tamanna Kashyap


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Ummeede

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Shiv Shakti

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