Khi door सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Khi door


कहीं दूर

कविता 

 कहीं दूर से आयीं

वो पुरानी सी विरासते 

यादों को लम्बी परछाईयां

बस गयी मेरे आगंन 

घर के कोने-कोने

कि जिस दीवार

जिस पेड को देखूं

मानो जग पड़ते हो

फिर से वो गुजर

जीये हुए सारे लम्हें

हंसते खेलते दिनों से

रात को तन्हाईयों के 

वो सारे सफर

कितना अच्छा था

वो रोज घर से निकलना

एक आवारा पाथिक के जैसे 

एक नव वटप के जैसे

जिसे की अभी

ये करना है कि 

किस किस्म के

फूल पत्ते फल आये

उसकी देह रूपी शाखों पर 

रोज नया सफर

एक नयी आशा ले

चल गुजरता

और रोज लौटता थककर

रात के अंधेरे माँ सा दुलार दे

सुला दे पीकर थकन सारी

ताकि फिर एक नयी 

सवेर के साथ जागूं 

ऊर्जा से संचारित हो भरकर

और फिर भागूं

उस आने वाले कल की 

प्यास में,

तलाश में

रोज धूप जिस्म के

छिद्रों से अन्दर का पानी 

खिंचकर बहा देती

पसीना बनाकर 

तो ठण्डी हवा भी

कभी कभी आ जाती 

सहलाने मन कहीं से

कि टूट ना जाए

मन के हौसले 

मौसमी इन प्रहारों से

और वक्त

मानो राज गणना करवाता

कि आज मुझे खोकर

तेरा हासिल क्या है

यही सिलसिला

भौर के साथ रोज जगता

सांझ को थकता

रात की गोद में 

सो जाता खो जाता 

सपनों के देश जिसमे 

ना जाने कितने सफर है 

उस एक मंजिल के

कि जिसकी तलाश में 

रोज एक नया दांव चलता है

वक्त अपनी शतरंज लिये

एक जादूगर सा 

अब जबकि रात के चांद

बड़े सुहाने लगते है 

उस भाग दौड़ में

रोज आता तो हैं

चांदनी सितारों से बारात लें

कुछ उन्माद जगाने

मगर को कुछ पर गुजरने की

चाहतें ऐसी कि सब बेजा सा लगे

और मन का एक कोना

बंजर सा रह जायें

वस्ल के दरिया बिना

किसी निगाह की तलाश में

बड़ा बेसुध सा सफर था

वो आसमां तक उठने का

या फिर एक नशा

कुछ कर गुजरने का

जोकि बचपन से भर गया 

मेरी नसों में लहू बनकर

और अंधे इस सफर में

शोहरतें, दौलतें रूतबा एक औदा

मैनें पाया भी

जोकि हर आदमी सोचता है

मगर फिर भी

जीने के लिए 

वो सब ही तो जरूरी नहीं

इस सफर में मैंने जो

खो गया उसको अनदेखी में

उस वक्त ,हां सच तो ये भी है

कि अधूरा �

👉हमसे जुडने के लिए यहाँ click करें👈

Poet

Ravi Lashkry

EDUCATION :
ADDRESS :
Hindi poet
 Hindi poet



Publisher

Om Tripathi

Contact No. 9302115955
आप भी अगर साहित्य उत्थान के इस प्रयास में अपनी मदद देना चाहते हैं तो UPI ID. 9302115955@paytm पर अपनी इच्छा अनुसार राशि प्रदान कर सकते हैं।

Social Media Manager

Shourya Paroha

अगर आप अपनी कविता प्रकाशित करवाना चाहते हैं तो आप व्हाट्सएप नंबर 7771803918 पर संपर्क करें।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

हमें बताएं आपको यह कविता कैसी लगी।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Ummeede

_   उम्मीदें उम्मीदें इस जहाँ में बस ख़ुदा से रखना तुम साबरी इंसान कभी किसी के साथ वफ़ा नहीं करते। जो क़ैद कर ले किसी को अपनी यादों में, तो मरने तक उनको उस यादों से रिहा नहीं करते। रूह से इश्क़ करना ये बस ख़्वाबों-ख़यालों  फिल्मों में सुन रखा होगा सबने, हक़ीक़त में इस जहाँ में लोग बिना जिस्म के इश्क़ का सौदा नहीं करते। वादे करके भूल जाना तो इंसान की फ़ितरत है। यहाँ वादे ख़ुदा से भी करके लोग पूरा नहीं करते। ~ Drx Ashika sabri (Age: 22) Bsc ,D pharma Varanasi(U.P)

Shiv Shakti

_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥ शिवालयों से शंखनाद हुआ,  गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन,  शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन,  और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव,  काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें,  संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति  हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो,  जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता,  काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका,  अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है,  जो त्याग और तप का है ज्ञान। ~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

Sannata

_  विरह का सन्नाटा सूरज छुपा धुँध के पीछे, आँखों में ठहरा आसमान। इस अकेलेपन की रात में, दिल ढूँढ रहा तेरे निशाँ। शहर सो गया, नींद के आगोश में, मेरा जहाँ बस तेरी यादों में सिमटा। चीख़ रहा अंदर सन्नाटा, बाहर का मौसम बदला। हर साँस में बस तेरी खुशबू, हर धड़कन पे तेरा पहरा। सन्नाटों में तेरा साया, नींद के आगोश में, शहर समाया ।। धुंधले हुए हैं रास्ते सारे, कैसे ढूँढूँ मैं अपनी डगर? खो गए हैं सारे सहारे, कहाँ ले जाएगा यह सफ़र? ख़ामोशी ने शोर मचाया, दिल ने फिर खुद से की उलझन। टूटे सपनों की राख तले, दबी हुई है मेरी चुभन। क्यों थम न जाता ये जीवन, थक-सा गया हर एक क्षण। चाँद भी आज बादलों का, ओढ़कर आया है कफ़न। ~ बाल कृष्ण मिश्रा,    नई दिल्ली