बीस रूपये के एक पाव
(कहानी)
पिताजी को बागवानी का बेहद शौक था , और उन्होंने एक बार खेत की मेड़ पर शहतूत के कुछ पौधे लगाए , अब उनकी प्रतिदिन की दिनचर्या हो गई की समय निकालकर रोज सुबह खेत पर जाते और नौकर होते हुऐ भी उन शहतूत के पौधो मे खुद पानी देते, उनकी निदाई-गुडाई करते , आसपास की खरपतवार साफ करते, उनकी मेहनत रंग लाई और कुछ महीनों की मेहनत से वे पौधे वृक्ष बनकर लहराने लगे ,गर्मियों मे उनमे फल आना भी शुरू हो गए, पिताजी खेत के आसपास के बच्चो को और हर आने वाले लोंगो को आग्रह कर ताजे ,मीठे और रसीले शहतूत खिलाते , शहतूत भी इतने आने लगे की उन्हें बेचा भी जा सकता था ,परन्तु उन्होने कभी उन्हे बेचने की इच्छा नहीं रखी ,वे रोज उनके फलों को खिलाकर ही खुश होते थे , परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की वह खेत मजबूरी के कारण बेचना पड़ा, पिताजी अब इस दुनिया मे नही है पर आज भी पिताजी के लगाऐ वे शहतूत पेड उनकी याद दिलाते है , वही पेड़, वही रसीले मीठे फल ,सब कुछ वही... बस ! फर्क है तो इतना ही की अब हमे पिताजी के लगाऐ इन पेड़ो के फल बीस रूपये पाव मे खरीदकर खाना पड़ते है !!
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Poet
Sanjay Daga
Publisher
Om Tripathi
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Social Media Manager
Shourya Paroha


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