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शीत की घड़ी

 



डोले  पछुआ की बयरिया 

आयी शीत की घड़ी

                 भोर भये जब पक्षीं बोले

                 सब जग-जन निज नैना खोलें

                 कर  जोरि  प्रणाम करहुँ दिनकर 

                 निशि तिमिर दूर आतप पाकर

ओस बिन्दु फसलों पर गिरके

ऐसे चमके जैसे नीलमणि


डोले पछुआ - - - - - - - - 

आयी- - - - - - - - - 

 

                  आयी मधुर बेला रजनी की

                   मन रही लुभाय दीप्ती चांँदनी की

                  प्रकाशमान तारों से अम्बर 

                  लगे खूब मनमोहक सुन्दर

झिलमिल झलकारी जुगनू की

जैसे हीरों का झड़ी


डोले पछुआ - - - - - - - - 

आयी- - - - - - - - -  


Written by

Tamanna kashyap


Rajaparapur,

Sitarpur, UP.



Posted by

Om Tripathi

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