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बेटी हूँ मैं

 



कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, 

यही सवाल करती हूँ।

लड़की हो लाचार बेचारी 

यही जवाब सुनती हूँ मैं,

 बड़ी हुई जब समाज 

की रस्मों को पहचाना

अपने सवाल का जवाब

   खुद में ही पाया। 

लाचार नहीं मजबूर नही 

एक धधकती चिंगारी हूँ,

 छेड़ो मत जल जाओगे

    दुर्गा हूँ काली हूँ,

 स्त्री के सब रूपों में, 

सबसे प्यारा रूप हूँ मैं  

जिसको माँ ने बड़े प्यार से पाला 

      वो फूल हूँ मैं।

 उस मां की बेटी हूँ मैं। 

       बेटी हूँ मैं।


Written by

Vartika Dubey

Phulpur, Prayagraaj

Posted by

Om Tripathi

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