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ज़िंदगी

 


फ़लसफ़ा ज़िंदगी का

ना कोई समझ पाया

पर ये वो तराना है

जो हर किसी ने गाया।

दुख की परछाइयां है

सुख के उजालों में

हर कोई जाना चाहे

बचपन के ज़माने में

रेस के घोड़े हैं

बाजिया लगाते है

छोटी छोटी खुशियों पर

शर्तें लगाते हैं

गैस के गुब्बारे से

उड़ते वो जाते हैं

कब हवा निकल जाए

भूल सब जाते हैं

खाली हाथ आकर भी

जेबों को वो भरते हैं।

खाली हाथ जाना है

शोहरत को तरसते हैं

नेकी की कमाई का

संदेश सब देते हैं

खुद पर आए जो 

मुंह फेर लेते हैं

पिंजरे का जो तोता है

इक दिन उड़ जाएगा।

 दुनियां से हस्ती क्या

नाम तलक मिट जाएगा


Written by

Anita Maishra


Hariana, Hoshiyarpur

Punjab

Posted by

Om Tripathi

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