फ़लसफ़ा ज़िंदगी का
ना कोई समझ पाया
पर ये वो तराना है
जो हर किसी ने गाया।
दुख की परछाइयां है
सुख के उजालों में
हर कोई जाना चाहे
बचपन के ज़माने में
रेस के घोड़े हैं
बाजिया लगाते है
छोटी छोटी खुशियों पर
शर्तें लगाते हैं
गैस के गुब्बारे से
उड़ते वो जाते हैं
कब हवा निकल जाए
भूल सब जाते हैं
खाली हाथ आकर भी
जेबों को वो भरते हैं।
खाली हाथ जाना है
शोहरत को तरसते हैं
नेकी की कमाई का
संदेश सब देते हैं
खुद पर आए जो
मुंह फेर लेते हैं
पिंजरे का जो तोता है
इक दिन उड़ जाएगा।
दुनियां से हस्ती क्या
नाम तलक मिट जाएगा
Written by
Anita Maishra
Hariana, Hoshiyarpur
Punjab
Posted by
Om Tripathi


Wonderful and also excellently described life and society 😌😌❤️❤️❤️
जवाब देंहटाएंThanks
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