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फूल सी बेटी


 फूल सी बेटी को मां बाप 

सौंप देते अनजाने हाथ में 

अपना मान कर चल देती है

 बेटी भी जिनके साथ में 

अपना तन-मन-धन लगाकर  

 घर वालों को अपना बनाती

अपना कहकर बेगाना मानते

 फिर भी वह पराई कहलाती

 मां बाप ने कोई बात ना सिखाई 

बेअकल है उठ कर आई 

चली जा तू अपने घर को 

मैंने तो आफत है लाई 

सौ सौ ताने सुनकर भी वह 

पति को अपना देवता माने

 हद तो तब होती है जब वह

 उसके दुख को ना पहचाने

 पति-पत्नी तो गाड़ी के ही 

 दो पहिए हैं माने जाते 

 पति पत्नी को नीचे दिखाएं तो

   पत्नी किसको दुख बतलाए

 अंदर अंदर घुटती रहे वो 

 अपना दुख ना किसी को बताए  

 पति ही गर ना समझ पाए तो 

  जीवन साथी क्यों कहलाए


Written by

-Anita Mishra


Haryana, Hoshiyarpur

Punjab

Posted by

-Om Tripathi

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