फूल सी बेटी सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

फूल सी बेटी


 फूल सी बेटी को मां बाप 

सौंप देते अनजाने हाथ में 

अपना मान कर चल देती है

 बेटी भी जिनके साथ में 

अपना तन-मन-धन लगाकर  

 घर वालों को अपना बनाती

अपना कहकर बेगाना मानते

 फिर भी वह पराई कहलाती

 मां बाप ने कोई बात ना सिखाई 

बेअकल है उठ कर आई 

चली जा तू अपने घर को 

मैंने तो आफत है लाई 

सौ सौ ताने सुनकर भी वह 

पति को अपना देवता माने

 हद तो तब होती है जब वह

 उसके दुख को ना पहचाने

 पति-पत्नी तो गाड़ी के ही 

 दो पहिए हैं माने जाते 

 पति पत्नी को नीचे दिखाएं तो

   पत्नी किसको दुख बतलाए

 अंदर अंदर घुटती रहे वो 

 अपना दुख ना किसी को बताए  

 पति ही गर ना समझ पाए तो 

  जीवन साथी क्यों कहलाए


Written by

-Anita Mishra


Haryana, Hoshiyarpur

Punjab

Posted by

-Om Tripathi

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Shiv Shakti

_ ॥ शिव-शक्ति संकल्प ॥ शिवालयों से शंखनाद हुआ,  गूंजा यह संदेश, हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। हर थिरकन में सृष्टि की लय, साँसों में ओमकार समाए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। सृष्टि का हर कण है पावन,  शक्ति का हर रूप अनमोल, नारी जब सँवारे घर-आँगन,  और रण में भरती हुँकार। दुर्गा बन संहारे दानव,  काली बन मिटाए अंधकार, उसकी ममता में विष्णु बसें,  संहार में बसा महेश का सार। ब्रह्मा-विष्णु-महेश की शक्ति  हर थिरकन में सृष्टि की लय हर नारी में दुर्गा जागे,  हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पुरुष जब ध्यान में लीन हो,  जटा में गंग बहे अविरल, डमरू की थाप पर नाचता,  काल भी बन जाए शांत और सरल। मिट जाए असुरत्व जगत से, सतयुग सा उजियारा आए। हर नारी में दुर्गा जागे, हर पुरुष शिव रूप बन जाए। पार्वती संग प्रेम है उसका,  अर्धनारीश्वर रूप महान, हर पुरुष में वही शिवत्व है,  जो त्याग और तप का है ज्ञान। ~ बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |

Dansh le jo tu mujhe

_   दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए ! यह कविता भीतर के सूनापन, अधूरेपन और गहरी मोहब्बत की उस कसक को व्यक्त करती है, जो यादों और चाहत के बीच इंसान को बेचैन भी करती है और सुकून भी देती है। भाव इतने गहरे हैं कि हर पंक्ति दिल की धड़कनों को छूती है। 💔 दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए 💔 बीते लम्हों का सूनापन तेरी यादों का महकता चंदन आंखें में थमी तेरी परछाई, रोशनी बनकर बूंदों में घुल जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | कहां मुमकिन है मोहब्बत को लफ्ज़ों में बयां कर पाना । आसान नहीं भुला, यादें सुकून की नींद में सो जाना । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | जीवन के पावन ‘निर्झर’ को, तुम यूँ ही बह जाने दो । एक पल, बस एक पल, नीले अँधेरे में गुम हो जाने दो । तारों की चादर ओढ़, चाँद की रोशनी में खो जाऊं । तेरी मोहब्बत की खुशबू में, खुद को फिर से पा जाऊं । ज़िस्म से रूह तलक, बस सुकून छा जाए । दंश ले जो तू मुझे, तो नींद आ जाए | तेरे बिना सारा जहाँ, सूना सा लगता है, जैसे एक सिसकी.… जैसे एक सिसकी । ये कैसा अधूरापन ? ये कैसा सूनापन ? शायद यही है इश्क...

Ummeede

_   उम्मीदें उम्मीदें इस जहाँ में बस ख़ुदा से रखना तुम साबरी इंसान कभी किसी के साथ वफ़ा नहीं करते। जो क़ैद कर ले किसी को अपनी यादों में, तो मरने तक उनको उस यादों से रिहा नहीं करते। रूह से इश्क़ करना ये बस ख़्वाबों-ख़यालों  फिल्मों में सुन रखा होगा सबने, हक़ीक़त में इस जहाँ में लोग बिना जिस्म के इश्क़ का सौदा नहीं करते। वादे करके भूल जाना तो इंसान की फ़ितरत है। यहाँ वादे ख़ुदा से भी करके लोग पूरा नहीं करते। ~ Drx Ashika sabri (Age: 22) Bsc ,D pharma Varanasi(U.P)