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धरती की पूकार




आंखों में थोड़ा अश्क लिए, 
       ह्रदय द्रवित करके कुछ बोली, 
तुम कितने निष्ठुर हो मानव, 
       नही अवगत मेरे आघात से तुम, 
सुनो! मैं तुमसे कुछ कह रही, 
       करके दुरूपयोग तुम मेरा,  
जूझ रहे संकट से आज, 
        वक्त अभी भी गया नहीं है, 
क्षमा के हो हकदार अभी तुम,  
        प्रलय से बचाकर धरा को आज, 
खुद को मुक्त करो कर्ज से तुम, 
        बचा लो आने वाली पीढ़ी के लिए, 
कृतज्ञ होगें वो कल तुम पर, 
        निर्भर होगा प्रकृति पर उनका जीवन, 
जियो ना बनकर मिट्टी के पुतले, 
        निर्माण करो फिर से इस जग का, 
जिसमें बहती मलय पवन हो, 
        निर्मल अमृत की जल धारा, 
कलरव करते विहंग धरा पर, 
        झूमते तरुवर की मुस्कान हो, 
आखों में थोड़ा अश्क लिए, 
        ह्रदय द्रवित करके कुछ बोली। । 

Written by
-Sinju Maurya
Allahabad,Jhunsi
(U.P) 
Posted by
-Om Tripathi


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