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Hava hu dikhti nhi

 

_हवा हूं दिखती नहीं

Poet Amrita Tripathi



हवा हूं दिखती नहीं बस महसूस करते हो तुम हमें वृक्षों के बीच से गुजरती हुई पत्तो की खड़खड़ा हट में लिपटती हुई रहती हूं
कभी कभी तुम मेरी आहट पाकर सिमट जाते हो मै जहां चाहती हूं वहा घूमती हूं मेरा कोई घर पता ठिकाना नहीं कभी मनभावन गंध वाले रंग बिरंगे फूलों पर तो कभी फंखुड़ियो पर पड़े ओस की बूंदों पर मैं पल पल तुमको महसूस होती हूं
मेरी जादूगरी है तुम्हारे साथ प्रकृति के कण कण में अनुगुंगित होती हूं
इस अनुपम संसार में हर पल हर तरफ हर जगह रहती हूं
बस कहा ना हवा हूं दिखती नहीं बस महसूस करते हो तुम

Amrita tripathi

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Amrita Tripathi

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